बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 34) 15 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 स्वार्थ बुद्धि से व्यवहृत होने वाले गृहस्थ को माया बन्धन कहा गया है, ‘‘मैं घर का स्वामी हूं। घर के प्रत्येक सदस्य को मेरी आज्ञाओं का पालन करना चाहिये, प्रत्येक को मेरी इच्छानुसार चलना चाहिए, प्रत्येक को मेरी मर्जी और सुविधा का आचरण करना चाहिए, मैं जिस तरह देखना चाहूं उस तरह रहना चाहिये’’ इस प्रकार की इच्छा और आकांक्षाओं को लेकर जो गृहस्थ में प्रवेश करता है, उसे निस्सन्देह उसमें नरक, दुःख, क्लेश, भार, बन्धन या माया के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

🔴 यह संभव नहीं कि सब लोग अपनी मन मर्जी के बन जावें। गुण कर्म और स्वभाव की भिन्नता हर मनुष्य में पाई जाती है, अनेक जन्मों के संचित संस्कारों के समूह द्वारा स्वभाव बनता है, प्रयत्न करने पर उसमें सुधार हो तो जाता है पर यह सम्भव नहीं कि कोई प्राणी अपनी मौलिकता को बिलकुल खोदे। हर व्यक्ति की रुचि-इच्छा, वृत्ति, भावना एवं प्रवृत्ति भिन्न होती है, मिट्टी के पुतले की तरह चुपचाप हर एक आज्ञा को मन, वचन और कर्म से कोई शिरोधार्य करले यह सम्भव नहीं।

🔵 इस प्रकार कुछ न कुछ मतभेद रहे ही, अपने स्वार्थों का संघर्ष नहीं मिट सकता, इस प्रकार आपकी आज्ञा मानने में जहां उसके निजी स्वभाव में स्वार्थ में संघर्ष होता होगा, वह व्यक्ति आज्ञा पालन में आनाकानी करेगा। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि अपनी मर्जी यदि पारिवारिक स्थिति की अपेक्षा बहुत आगे बढ़ गई तो भी दूसरे उसे मानने में तत्पर न होंगे। ऐसी दशा में जो असन्तोष, मन मुटाव, क्रोध, कलह एवं संघर्ष होगा वह अशान्ति का कारण बनेगा। घर में दुख ही दुख दिखाई देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...