बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 33) 14 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 आप सब आत्म निरीक्षण द्वारा अपनी भूलों को देखें तो देखकर निराश न हों वरन् इस भावना को मनःक्षेत्र में स्थान दें— ‘‘वीर योद्धा की तरह मैं जीवन युद्ध में रत हूं। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते समय के जो बुरे संस्कार अभी हम लोगों में लगे हुए शेष रह गये हैं, वे बार बार मार्ग में विघ्न उपस्थित करते हैं, कभी मैं गलती कर बैठता हूं कभी दूसरे गलती कर देते हैं, आये दिन ऐसे विघ्न सामने आते रहते हैं, परन्तु मैं उससे जरा भी विचलित नहीं होता, मैं नित्य इन कठिनाइयों से लड़ूंगा।

🔴  ठोकर या चोट खाकर भी चुप न बैठूंगा। गिर पड़ने पर फिर उठूंगा और धूलि झाड़कर फिर युद्ध करूंगा। लड़ने वाला ही गिरता और घायल होता है, कुसंस्कार यदि मुझे गिरा देते हैं तो भी मुझे उनके विरुद्ध युद्ध जारी रखना चाहिए। मैं सत्य मार्ग का पथिक हूं सच्चिदानन्द आत्मा हूं, अपने और दूसरे के कुसंस्कारों से निरन्तर युद्ध जारी रखना और उन्हें परास्त कर देने तक दम न लेना ही मेरा कर्तव्य है। मैं अपने संकल्प, व्रत, साधन और उद्देश्य के प्रति सच्चा हूं। अपनी सच्चाई की रक्षा करूंगा और इन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करके रहूंगा। भूलों को नित्य परखने, पकड़ने और उन्हें हटाने का कार्य मैं सदा एक रस उत्साह के साथ जारी रखूंगा।’’

🔵 उपरोक्त मन्त्र की सफलता के निरीक्षण के साथ मनन करना चाहिए। इससे निराशा नहीं आने पाती। गृहस्थ योग के मूलभूत सिद्धान्तों का बीज मन्त्र, दृढ़ता का संकल्प और त्रुटियों में धर्म युद्ध जारी रखने की प्रतिक्षा यह तीनों ही महामंत्र साधक की मनोभूमि में खूब गूंजने चाहिये। अधिक से अधिक समय इन विचारधाराओं में ओत-प्रोत रहना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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