बुधवार, 3 मई 2017

👉 सद्गुरु के स्वर

🔵 अन्तःकरण के मौन में गुरुदेव की परावाणी गूँजती है- अहो! मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। तुम चाहे जहाँ जाओ, वहाँ मैं उपस्थित हूँ ही। मैं तुम्हारे लिए ही जीता हूँ। अपनी अनुभूति के फल मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मेरे हृदय-धन हो। मेरी आँखों के तारे हो। प्रभु में हम एक हैं। मैं सदा-सर्वदा तुमसे एकता की अनुभूति करता हूँ। तुम्हें कठिन संघर्षों की धधकती-च्वालाओं में झोंक देने में मुझे भय नहीं होता, यह इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी शक्ति की मात्रा को जानता हूँ। मैं तुम्हें अनुभवों के बाद अनुभवों में भेजता हूँ, किन्तु तुम्हारे इस भ्रमण में मेरी दृष्टि सदैव तुम्हारा पीछा करती रहती है। तुम जो भी करते हो, वह सब मेरी उपस्थिति में करते हो।

🔴 मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूँढ़ो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो, जो मेरे गुरु ने मुझे दी थीं और जिसे मैंने तुम्हें दिया है। जो एक है, उसी का दर्शन करो, तब तुम मेरे सहस्रों शरीरों के साथ रहकर जितनी एकता का अनुभव करते, उससे कहीं अधिक एकता का अनुभव करोगे। मेरी इच्छा और विचारों के प्रति जागरूकता, स्थिरता और भक्ति में ही शिष्यत्व है, हम दोनों के बीच असीम प्रेम है। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वज्र से भी अधिक दृढ़ होता है। वह मृत्यु से भी अधिक सशक्त होता है।
  
🔵 इस सत्य को अनुभव करते हुए यह ध्यान रखो वत्स! इन्द्रियाँ सदैव आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती हैं। अतः सतत सावधान रहो, इन्द्रियों पर विश्वास न करो। ये सुख तथा दुःख के द्वारा विचलित होती रहती हैं। उनके ऊपर उठ जाओ। तुम आत्मा हो, मेरे अविनाशी अंश हो। शरीर का किसी भी क्षण नाश हो सकता है। सचमुच कौन उस क्षण को जानता है। इसलिए सदैव अपनी दृष्टि लक्ष्य पर स्थिर रखो, अपने मन को मेरे विचारों से परिपूर्ण कर लो। मृत्यु के क्षणों में नहीं, किन्तु जीवन के इन्हीं क्षणों में अपने मन को मुक्त और पवित्र रखो। तब यदि मृत्यु अकस्मात् तुम्हें ग्रास बना ले, तो भी तुम प्रस्तुत हो। इस प्रकार जीवन जिओ, मानो इसी क्षण तुम्हारी मृत्यु होने वाली है, तभी तुम सच्चा जीवन जी सकोगे। समय भाग रहा है। यदि तुम शाश्वत तथा अमर विचारों में डूबे रहो, तभी भागते समय को शाश्वत बना सकोगे।

🔴 हर किसी को अपने आदर्श के लिए अनेकों तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो। आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। भगवान् पर सच्ची निर्भरता सभी भयों को भगा देती है। तुम मेरी सन्तान हो। जीवन में या मृत्यु में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे बँधा हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। फिर चिन्ता किस बात की निश्चिन्त रहो, निर्भीक बनो।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 53

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