मंगलवार, 2 मई 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 91)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 बाजरे का-मक्का का एक दाना सौ दाने होकर पकता है। यह उदाहरण हमने अपनी संचित सम्पदा के उत्सर्ग करने जैसा दुस्साहस करने में देखा। जो था, वह परिवार के लिए उतनी ही मात्रा में, उतनी ही अवधि तक दिया, जब तक कि वे लोग हाथ पैरों से कमाने-खाने लायक नहीं बन गए। उत्तराधिकार में समर्थ संतान हेतु सम्पदा छोड़ मरना, अपना श्रम मनोयोग उन्हीं के लिए खपाते रहना हमने सदा अनैतिक माना और विरोध किया है। फिर स्वयं वैसा करते भी कैसे? मुफ्त की कमाई हराम की होती है, भले ही वह पूर्वजों की खड़ी की हुई हो। हराम की कमाई न पचती है, न फलती है। इस आदर्श पर परिपूर्ण विश्वास रखते हुए हमने शारीरिक श्रम, मनोयोग, भाव संवेदना और संग्रहीत धन की चारों सम्पदाओं में से किसी को भी कुपात्रों के हाथ नहीं जाने दिया है।

🔵 उसका एक-एक कण सज्जनता के सम्वर्धन में, भगवान की आराधना में लगाया है। परिणाम सामने है। जो पास में था, उससे अगणित लाभ उठा चुके। यदि कृपणों की तरह उन उपलब्धियों को विलास में, लालच में, संग्रह में, परिवार वालों को धन-कुबेर बनाने में खर्च किया होता, तो वह सब कुछ बेकार चला जाता। कोई महत्त्वपूर्ण काम न बनता, वरन् जो भी उस मुफ्त के श्रम साधन का उपयोग करते वे दुर्गुण, दुर्व्यसनी बनकर नफे में नहीं, घाटे में ही रहते। कितने पुण्य फल ऐसे हैं, जिनके सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, पर लोक साधना का परमार्थ ऐसा है, जिसका प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पोंछते समय असाधारण आत्म-संतोष होता है। कोई बदला न चुका सके, तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है, आशीर्वाद देता है, इसके अतिरिक्त और एक ऐसा दैवी विधान जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है, उसकी भरपाई करता रहता है। 

🔴 भेड़ ऊन कटाती रहती है, हर वर्ष उसे नई ऊन मिलती है। पेड़ फल देते हैं, अगली बार टहनियाँ फिर उसी तरह लद जाती हैं, बादल बरसते हैं, पर खाली नहीं होते। अगले दिनों वे फिर उतनी ही जल सम्पदा बरसाने के लिए समुद्र से प्राप्त कर लेते हैं, उदारचेताओं के भण्डार कभी खाली नहीं हुए। किसी ने कुपात्रों को अपना श्रम-समय देकर भ्रमवश दुष्प्रवृत्तियों का पोषण किया हो और उसे भी पुण्य समझा हो तो फिर बात दूसरी है। अन्यथा लोक साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है, जो हाथों-हाथ मिलता है। आत्मसंतोष, लोक सम्मान, दैवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला व्यवसाय ऐसा है, जिसने भी हाथ डाला कृत-कृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं, जो चतुरता का दम भरते किंतु हर दृष्टि से घाटा उठाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Last Part)

🔵 Don’t forget to visit my KACHCHA house, if you go to my village sometime in future. All the houses that time in village were KACCHCHE...