बुधवार, 19 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (अंतिम भाग)

🌹 इन दिनों की सर्वोपरि आवश्यकता

🔵 इतने पर भी एक कठिनाई फिर भी ज्यों-की-त्यों रह जाती है कि अंत:करण की गहराई तक प्रवेश करके उन्हें क्रियान्वित होते देखने की आशा-संभावना तभी पूरी होती है, जब उस हेतु प्रखर प्रतिभाएँ निखरकर, आगे बढ़कर आएँ और मोर्चा सँभालें। यह कार्य घटिया लोगों का नहीं है, उनकी कृतियाँ उपहासास्पद बनती हैं। दूरवर्ती अनजान लोग किसी की वाचालता पर सहज विश्वास नहीं करते और जो मन, वचन, कर्म से आदर्शों के प्रति समर्पित हों, ऐसे लोग ढूँढ़े नहीं मिलते। इस विसंगति के कारण लोकमानस में अभीष्ट परिवर्तन बन नहीं पड़ता और अनेक विडम्बनाओं की तरह धर्मोपदेश भी मनोरंजन का एक निमित्त कारण बनकर रह जाता है।      

🔴 कठिनाई यही दूर करनी है। स्रष्टा का अवतरण इन्हीं दिनों इस प्रकार होना है, जिसमें भावनाशील लोग अपनी कुत्सा-कुंठाओं पर विजय प्राप्त करें। ब्राह्मणोचित जीवन अंगीकार करें और अपना समग्र व्यक्तित्व इस स्तर का ढालें, जिसके प्रभावक्षेत्र में आने वाले सभी लोग यह विश्वास कर सकें कि उत्कृष्टता की पक्षधर आदर्शवादिता, कार्यरूप में अपनाई जा सकती है और उसमें हानि-ही-हानि सहनी पड़े, ऐसी बात नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सुविधा-साधनों में कुछ कमी हो सकती है, पर उसके बदले जो आत्मसंतोष, लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह उपलब्ध होता है, वह इतने कम महत्त्व का नहीं है, जिसे संकीर्ण स्वार्थपरता के बंधनों में बँधे, रोते-कलपते जीवन की तुलना में किसी भी प्रकार कम महत्त्व का माना जा सके।                          

🔵 इन दिनों यही होना चाहिए, संभवत: होने भी वाला है। भाव-संवेदना मात्र कल्पना-जल्पना के क्षेत्र तक सीमित न रहे वरन् कार्यक्षेत्र में उतरे और अपनी सामर्थ्य के अनुरूप प्रचार-प्रयोजनों में से उन्हें अपनाएँ, जो उसके लिए संभव और स्वाभाविक हैं।

🔴 ऐसे परामर्श हर परिष्कृत अंत:करण में दैवी प्रेरणा से अनायास ही अवतरित हो रहे हैं। आवश्यकता मात्र उन्हें हृदयंगम करने और कार्यरूप में परिणत करने भर की है।

👉 प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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