बुधवार, 19 अप्रैल 2017

👉 शान्तिकुञ्ज - प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष

🔵 कल्पवृक्ष का अस्तित्व स्वर्गलोक में माना जाता है और कहा जाता है कि उसकी अमुक विधि से पूजा-प्रार्थना करने पर अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस अदृश्य एवं रहस्यमय प्रतिपादन में सन्देह करने की गुंजाइश है।

🔴 किन्तु भूलोक के इस कल्पवृक्ष का अनुभव हर कोई कर सकता है, जिसे शान्तिकुञ्ज कहते हैं। परम पूच्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी ने इसे रोपा, अपनी सम्मिलित तपशक्ति से खाद-पानी देकर इसे बड़ा किया। ४७ वर्षों में अब यह इतना बड़ा हो गया है कि समस्त विश्व को इसके शीतल समीर का अहसास होने लगा है। यह अद्भुत, अनुपम और असाधारण है। यह दिव्य भी है और महान भी। इसके अन्तराल में सम्भावनाओं और सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं। जरूरत इसकी छाया में बसने और उन्हें उठाने की है।

🔵 पूज्य गुरुदेव के शब्दों में इसी कल्पवृक्ष पर भगवान् महाकाल का घोंसला है। यही युगान्तरीय चेतना का हेडक्वार्टर है। विश्व के नवनिर्माण में लगी समस्त सूक्ष्म-शक्तियों के अभियान का केन्द्रीय कार्यालय यही है। हिमालय के दिव्यक्षेत्र में बसने वाली ऋषिसत्ताएँ सूक्ष्म-रूप से यहाँ विचरण करती हैं। यहाँ आने वाले लोगों के हृदयों में उज्ज्वल प्रेरणाओं का संचार करती हैं। दिव्य देहधारी देवसत्ताएँ यहाँ आने वाले आर्त, कष्टपीड़ित जनों की पीड़ा निवारण कर उनकी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं।

🔴 यह देवभूमि सबसे प्रत्यक्ष, सबसे निकट और सबसे वरदायी देवता हैं। यहाँ के कण-कण में व्याप्त प्रकाश ऋषियुग्म का तप प्राण काले, कुरूप और अनगढ़ लोहे जैसे व्यक्तित्व को खरे सोने में बदल देता है। जीवन की दशा और दिशा आमूल-चूल बदल जाती है। उनके आशीर्वाद का अमृत सिंचन जीवन में नवप्राण भरता है, नयी ऊर्जा का संचार करता है।

🔵 कहा जाता है कि कल्पवृक्ष से भी कुछ प्राप्त करने का एक निश्चित विधि-विधान है। शान्तिकुञ्ज भी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। इससे वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है, जो कल्पवृक्ष से अभीष्ट है। शर्त एक ही है कि अभीष्ट की प्राप्ति के लिए यहाँ रहकर साधनात्मक दिनचर्या अपनाई जाय। इसकी छाया में रहकर साधना परायण जीवन जीने वालों की झोली मनचाहे अनुदानों-वरदानों से भरपूर हुए बिना नहीं रहती।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 33
 
 
 

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय डॉ साहब
    सादर प्रणाम
    वर्ष २०१६ के जून माह के पूर्वार्ध में मुझे शांतिकुंज जाने का मौका मिला था.वह मैंने 1 रातें बितायी.जहाँ तक मुझे याद है मेरे आदरणीय पिताजी और माताजी ने 3 दिनों तक निःशुल्क रुकने वाला आवेदन दिया था. मैं jaminy hall में ठहरा हुआ था.बड़े दुःख के साथ बताना पर रहा है कि उस एक रात की भयावहता मुझसे अब तक भूली नहीं जा रही है.उस हॉल कि व्यवस्था देखने वाले कार्यकर्त्ता का व्यवहार ऐसा था मानो मैं किसी चम्बल के क्षेत्र के डाकुओं से बातें कर रहा होऊ.डंडे लेकर बुजुर्गों को धमकाना,उन्हें बाहर निकाल फेंकने की धमकी देना,महिलाओं के साथ क्रोधित कर देने वाला व्यवहार करना और उसके ऐसे व्यवहार की सुनवाही कहीं न होना आश्चर्यचकित कर देने वाला था.अंततः मुझे उसको यह धमकी देनी पड़ी कि मैं सीधे आदरणीय प्रणव पंड्या को इ मेल से शिकायत कर दूंगा.फिर जाकर उसके व्यवहार में थोड़ी नम्रता आ पाई.
    अगले ही दिन मैं वहां से वापिस आ गया.साल भर बीतने के पश्चात् मैं वाकये को इसलिए दुहरा रहा हूँ कि आपका मेल आया था जिसमें अनेक अच्छी बातें लिखी हुई थी.
    आदरणीय डॉ साहब मैं आपके समाजकार्य के अथक प्रयासों को नमन करता हूँ परन्तु बताना चाहता हूँ कि संस्था की कार्य प्रणाली में मैंने गिरावट महसूस की है.मेरे आदरणीय माता पिता और सभी सम्बन्धी वर्ष 1990 से ही आपकी संस्था से जुड़े हुए है,परन्तु उनको भी मैंने व्यवस्था से दुखी देखा.अगर आपकी संस्था में भी वही बुराई घर कर जाती है जिसके आधार पर अन्य धर्मों का पतन हुआ है तो उनकी आस्था को बहुत अधिक ठेंस लगेगी. आशा है आप मेरी बातों के गूढार्थ को समझते हुए मेरी कठोर टिप्पणी को सकारात्मक तरीके से स्वीकार करेंगे .
    सादर प्रणाम
    डॉ संजन कुमार

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