बुधवार, 19 अप्रैल 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (अन्तिम भाग)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 हमारी उपासना और साधना साथ- साथ मिलकर चली हैं। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये, वरदान केवल यह माँगा कि हमें अपनी सहृदयता और विशालता मिले, जिसके अनुसार अपने में सबको और सबमें अपने को अनुभव किया जा सकना सम्भव हो सके। १४ महा पुरश्चरणों का तप, ध्यान, संयम सभी इसी परिधि के इर्द- गिर्द घूमते रहे हैं।           

🔵 अपनी साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए, समक्ष आये उतार- चढ़ावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो, तो वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालों के लिए यह सब कैसे सम्भव हो सका है? इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढ़ना हो, तो हमारी जीवन यात्रा बहुत मार्गदर्शन कर सकती है। वस्तुत: हमने एक प्रयोगात्मक जीवन जिया है। आध्यात्मिक आदर्शों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है, हम ऐसे तथ्य की खोज करते हैं और उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधियाँ केन्द्रित करते रहे हैं। हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा- पूरा सहयोग रहा, सो अनावश्यक जाल- जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरसता उपलब्ध होती रही है। उसी की चर्चा इन पंक्तियों में इस उद्देश्य से कर रहे हैं कि जिन्हें मार्ग पर चलने और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढने की आवश्यकता है उन्हें अनुकरण के लिए प्रमाणित आधार मिल सके।

🔴 आत्मिक प्रगति के पथ पर एक सुनिश्चित एवं क्रमबद्ध योजना के अनुसार चलते हुए 'हमने एक सीमा तक अपनी मंजिल पूरी कर ली हें और उतना आधार प्राप्त कर लिया है जिसके बल पर यह अनुभव किया जा सके कि परिश्रम निरर्थक नहीं गया, प्रयोग असफल नहीं रहा । क्या विभूतियाँ या उपलब्धियाँ प्राप्त हुई इसकी चर्चा हमारे मुँह शोभा नहीं देती। इसके जानने- सुनने और खोजने का अवसर हमारे चले जाने के बाद ही आना चाहिए। उसके इतने अधिक धक प्रमाण बिखरे पड़े मिलेंगे कि किसी अविश्वासी को भी यह विश्वास करने के लिए विवश किया जा सकेगा, कि न तो आत्म विद्या का विज्ञान गलत है और न उस मार्ग पर सही ढंग से चलने वाले के लिए आशाजनक सफलता प्राप्त करने में कोई कठिनाई है। इस मार्ग पर चलने वाले आत्म शान्ति आन्तरिक और दिव्य अनुभूति की परिधि में घूमने वाली अगणित उपलब्धियों से कैसे लाभान्वित हो सकते है? इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ढूँढ़ने के लिए भावी शोधकर्ताओं को हमारी जीवन- प्रक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। समयानुसार ऐसे शोधकर्ता उन विशेषताओं और विभूतियों के अगणित प्रमाण- प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं ढूँढ़ निकालेंगे जो आत्मवादी- प्रभु जीवन मे हमारी तरह हर किसी को उपलब्ध हो सकना सम्भव है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan.4

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Aug 2017

🔴 जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्...