मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (भाग 3)

🔴 जिस प्रकार शरीर को सुनिश्चित दिनचर्या के अनुशासन में बाँधने वाला कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है, वैसी ही बात मानसिक नियंत्रण के बारे में भी है। बुद्धिमान लोग अपनी अनगढ़ कल्पनाओं को रोकते रहते हैं और चिन्तन को उसी क्षेत्र में कल्पनाएं करने की छूट देते हैं जिनसे कोई कारगर प्रयोजन सधता हो।

🔵 ऐसे ही लोग अपनी प्रखर बुद्धिमत्ता के सहारे किसी निष्कर्ष पर पहुँचते और दिशाधारा निर्धारित करते हैं। लक्ष्य निर्धारित हो जाने पर उसका मार्ग ढूँढ़ने और साधन जुटाने के निमित्त चेतना शक्ति लगती है और निश्चित मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलते हुए सफलता ही उस स्थिति तक पहुँचा जाता है जिस पर गर्व, हर्ष और संतोष की अनुभूति हो सके।

🔴 शरीरगत अनुशासन, मनोगत निर्धारण से आगे की भूमिका है- मन को इच्छित, उपयोगी दिशा में ले चलने की संकल्प शक्ति। यह स्वभावतः किन्हीं बिरलों में ही होती है। इसे अर्जित एवं समुन्नत करने के लिए मनुष्य को विशेष रूप से प्रयत्न करना पड़ता है। सरकस वाले जिस प्रकार अपने जानवरों को आश्चर्यजनक करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, ठीक उसी प्रकार साधनापरक हंटर के सहारे मन को मात्र सुविचारों में संलग्न होने के लिए- उपयुक्त एकाग्रता अर्जित करने के लिए- प्रयत्न करना पड़ता है। यही ध्यानयोग का स्वरूप एवं उद्देश्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.4

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