शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

👉 ‘साधना से सिद्धि’ में बाधक संचित दुष्कर्म (भाग 2)


🔵 आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है–आज का अध्ययन व्यायाम, व्यवसाय आज ही कहाँ फल देता है? परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं, पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा, विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता–जिस दिन चोरी की जाय, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े ऐसा कहाँ होता है? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं, परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्मों, दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए। पर लोग भ्रम ग्रस्त होकर–कर्मफल के सम्बन्ध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकारी को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।

🔴 दुष्कर्मों का प्रतिफल कई रूपों में भुगतना पड़ता है। लोक निन्दा होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अप्रामाणिक−अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें किसी का सघन विश्वास एवं सच्चा सहयोग नहीं मिलता। श्रद्धा और सम्मान तो उसी को मिलता है, जिसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होती है। जन−विश्वास एवं सहयोग के आधार पर कोई व्यक्ति प्रगति करता और सफल होता है। संदिग्ध चरित्र व्यक्तियों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है और वे मित्र विहीन एकाकी नीरस जीवन जीते हैं। घनिष्ठता का लाभ तो उन्हें स्वजनों से भी नहीं मिलता। वे भी सदा आशंका की ही दृष्टि से देखते हैं और दिखावे का सहयोग दे पाते हैं, आत्म प्रताड़ना का दुरूह दुःख ऐसे ही लोगों को सहना पड़ता है। दूसरों को झुठलाया जा सकता है, पर अपनी ही आत्मा को कैसे बहकाया जाय? वह दुष्कर्मों से स्वयं खिन्न रहती है। आत्मधिक्कार से आत्मबल निरन्तर गिरता जाता है।

🔵 समाज तिरस्कार, असहयोग, विरोध, उपेक्षा से प्रत्यक्ष हानि है। जिसके ऊपर घृणा और तिरस्कार बरसता है, उसकी अन्तरात्मा को पत्थर बरसने से भी अधिक अन्तःपीड़ा सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी हानि नहीं है जितना कि विश्वास, सम्मान और सहयोग चला जाना। दुष्कर्मों का यह सामाजिक दण्ड हर कुमार्गगामी को भुगतना पड़ता है। पाप और पारा छिपता नहीं। वह फूट−फूट कर देर−सबेर में बाहर निकलता ही है। सत्कर्म छिप सकते हैं, दुष्कर्म नहीं। हींग की गन्ध कई थैलियों में बन्द करके रखने पर भी फैलती है और दुष्कर्मों की दुर्गन्ध हवा में इस तरह उड़ती है कि किसी के छिपाए नहीं छिपती। समाज दण्ड−असहयोग बहिष्कार के रूप में तो बरसता है।

🔴 कई बार वह प्रतिशोध और प्रत्याक्रमण के रूप में भी सामने आता है। लोग अनीति के विरुद्ध उबल पड़ते हैं तो दुरात्मा का कचूमर ही निकाल कर रख देते हैं। न केवल अध्यात्म क्षेत्र में वरन् भौतिक जीवन में भी यही सिद्धान्त काम करता है। रक्त विकार जैसे रोगों को दूर करने के लिए कुशल वैद्य पेट की सफाई करने के उपरान्त अन्य रक्त शोधक उपचार करते है। काया−कल्प चिकित्सा में बलवर्धक औषधियों को नहीं, संचित मलों का निष्कासन करने वाले उपायों को ही प्रधान रूप से कार्यान्वित किया जाता है। नमन, विरेचन, स्वेदन आदि क्रियाओं द्वारा मल निष्कासन का ही प्रयास किया जाता है। इसमें जितनी सफलता मिलती जाती है। उसी अनुपात से जरा−जीर्ण रोग ग्रस्त व्यक्ति भी आरोग्य लाभ करता और बलिष्ठ बनता चला जाता है। काया कल्प चिकित्सा का विज्ञान इसी सिद्धान्त पर आधारित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1982 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1982/February.47

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