शनिवार, 6 अगस्त 2016

👉 ‘साधना से सिद्धि’ में बाधक संचित दुष्कर्म (भाग 3)



🔵 दोष−दुर्गुणों के रहते चिरस्थायी प्रगति के पथ पर चल सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हुआ है। फूटे बर्तन में दूध दुहने से पल्ले कुछ नहीं पड़ता। पशु पालने और दुहने का श्रम निरर्थक चला जाता है। कषाय−कल्मषों से–दोष दुर्गुणों से लड़ने के लिए जो संघर्ष पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी के विधि−विधानों को तप साधना कहते हैं।

🔴 आयुर्वेद के प्रख्यात ग्रन्थ माधव निदान के प्रणेता माधवाचार्य अपने साधना काल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महापुरश्चरणों में संलग्न थे। उन्होंने पूर्ण विधि−विधान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये।

🔵 काशी के गंगा तट पर वे बड़ी दुःखी मनःस्थिति में बैठे हुए थे कि उधर से एक अघोरी कापालिक आ निकला। साधक की वेशभूषा और छाई हुई खिन्नता जानने के लिए वह रुक गया और कारण पूछने लगा माधवाचार्य ने अपनी व्यथा कह सुनाई। कापालिक ने आश्वासन दिया कि उसे भैरव की सिद्धि का विधान आता है। एक वर्ष तक उसे नियमित रूप से करते रहने से सिद्धि निश्चित है। माधवाचार्य सहमत हो गये और कापालिक के बताये हुए विधान के साथ मणिकर्णिक घाट श्मशान भूमि की परिधि में रहकर साधना करने लगे। बीच−बीच में कई डरावनी, लुभावनी परीक्षा होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा एक वर्ष पूरा होते−होते ही भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1982 पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1982/February.48

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