गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 अपनी तृप्ति को धर्म मत बनाओ

🔵 धर्म का एक निश्चित विश्वास है, पारलौकिक जीवन की सुख-शांति और बंधन, मुक्ति। पर उस विश्वास की पुष्टि कैसे हो, इसके लिए धर्म की एक कसौटी है और वह यह है कि व्यक्ति का प्रस्तुत जीवन भी शांत-बंधनमुक्त, कलह, अज्ञान और अभाव मुक्त होना चाहिए।

🔴 धर्म का पालक बनें किंतु वह विशेषताएँ परिलक्षित न हों तो यह मानना चाहिये, वहाँ धर्म नहीं, अपनी तृप्ति का कोई खिलवाड या षड्यंत्र चल रहा है। आज सर्वत्र ऐसे ही भोंडे धर्म के दर्शन होते हैं। विचारशील व्यक्ति ऐसे धर्म को कभी भी स्वीकार नहीं करते, चाहे उसके लिए कितना ही दबाव पडे़, दुराग्रह हो या भयभीत किया जाए।

🔵 प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लेटो के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है, जब उन्होंने जीवन का संकट मोल लेकर भी इस तरह के अंध-विश्वास का प्रतिवाद किया।

🔴 एक बार नगर के एक देव मंदिर में कोई उत्सव था। नगरवासी प्लेटो को उसमें सम्मिलित होने के लिए सम्मानपूर्वक ले आए। नगरवासियों के प्रेम और आग्रह को प्लेटो ठुकरा न सके उत्सव मे सम्मिलित हुए। वैसे उनका विचार यह था कि इस तरह के उत्सव आयोजनों में किया जाने वाला व्यय मनुष्य के कल्याण में लगना चाहिए। बाहरी टीमराम, दिखावे या प्रदर्शनबाजी में नहीं।

🔵 मंदिर में जाकर एक नया ही दृश्य देखने को मिला। नगरवासी देव प्रतिमा के सामने अनेक पशुओं की बलि चढ़ाने लगे। जो भी आता, एक पशु अपने साथ लाता। देव प्रतिमा के सामने खडा़ कर उस पर तेज अस्त्र से प्रहार किया जाता है। दूसरे क्षण वह पशु तड़पता हुआ अपने प्राण त्याग देता और दर्शक यह सब देखते, हँसते-इठलाते और नृत्य करते।

🔴 जीव मात्र की अंतर्व्यथा की अनुभूति रखने वाले प्लेटो से यह दृश्य देखा न गया। उन्होंने पहली बार धर्म के नाम पर नृशंस आचरण के दर्शन किए। वहाँ दया, करुणा, संवेदना और आत्म-परायणता का कोई स्थान न था।

🔵 वे उठकर चलने लगे। उनका हृदय अंतर्नाद कर रहा था। तभी एक सज्जन ने उनका हाथ पकड़कर कहा- 'मान्य अतिथि आज तो आपको भी बलि चढा़नी होगी, तभी देव प्रतिमा प्रसन्न होगी। लीजिये यह रही तलवार और यह रहा बलि का पशु। वार कीजिए और देव प्रतिमा को अर्ध्यदान दीजिए।''

🔴 प्लेटो ने शांतिपूर्वक थोड़ा पानी लिया। मिट्टी गीली की उसी का छोटा सा जानवर बनाया। देव प्रतिमा के सामने तलवार चलाई और उसे काट दिया और फिर चल पडे घर ओर।

🔵 अंध-श्रद्धालु इस पर प्लेटो से बहस करने लगे- 'क्या यही आपका बलिदान है।'

🔴 हाँ प्लेटो ने शांति से कहा- ''आपका देवता निर्जीव है, निर्जीव भेंट उपयुक्त थी-सो चढा़ दी, वह खा-पी सकता इसलिए उसे मिट्टी चढ़ाना बुरा नहीं।

🔵 उन धर्मधारियों ने प्रतिवाद किया और कहा कि जिन लोगों यह प्रथा चलाई "क्या वे मूर्ख थे, क्या आपका अभिप्राय यह कि हमारा यह कृत्य मूर्खतापूर्ण है ?"

🔴 प्लेटो मुस्कराए, पर उनका अंतर कराह रहा था। जीवन मात्र के प्रति दर्द का भाव अब स्पष्ट ही हो गया। उन्होंने निर्भीक भाव से कहा- ''आप हों या पूर्वज, जिन्होंने भी यह प्रथा चलाई-पशुओं का नहीं, मानवीय करुणा की हत्या का प्रचलन किया है। कृपया देवता को कलंकित करो, न धर्म को। धर्म, दया और विवेक पर्याय है, हिंसा और अंध विश्वास का पोषक नहीं हो सकता।''

🔵 इस प्रश्न का जबाव किसी के पास न था। नगरवासी सिर सुकाए खडे रहे। प्लेटो उनके बीच से चले आए। ऐसे ही धर्म को स्वार्थ-साधन बनाने वालों के पास से परमात्मा भाग जाते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 73, 74

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