गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 11)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 भ्रांतियों का स्वरूप समझ लेने के उपरांत यह भी आवश्यक है कि उसका समाधान भी समझा जाए और यह जानने का प्रयत्न किया जाए कि वह वास्तविकता क्या है, जिसकी आड़ लेकर धुएँ का बादल बनाकर खड़ा कर दिया गया।    

🔴 समझा जाना चाहिये कि संसार के दृश्यमान जड़-पदार्थों के साथ-साथ ऐसी एक सर्वव्यापी नियामक सत्ता भी है, जो इस आश्चर्य भरे ब्रह्माण्ड को बनाने से लेकर और भी न जाने क्या-क्या बनाती रहती है।  

🔵 असल की नकल इन दिनों खूब चल पड़ी है। नकली चीजें सस्ती भी होती हैं। चलती भी अधिक हैं और बिक्री भी उन्हीं की अधिक होती देखी जाती है। नकली सोने के, नकली चाँदी के जेवरों की दुकानों में भरमार देखी जाती है। नकली हीरे-मोती भी खूब बिकते हैं। नकली रेशम, नकली दाँत अधिक चमकते हैं। नकली घी से दुकानें पटी पड़ी हैं। नकली शहद सस्ते भाव में कहीं भी मिल सकता है, पर वह वस्तुएँ ऐसे चमकीली होते हुए भी असली जैसा सम्मान नहीं पातीं। बेचने पर कीमत भी नहीं उठती। अध्यात्म का नकलीपन भी बहुत प्रचलित हुआ है। 
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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