गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 73)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 गायत्री माता का परम तेजस्वी प्रकाश सूक्ष्म शरीर में- अंत:करण में- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में प्रवेश करते और प्रकाशवान होते देखा तथा अनुभव किया कि ब्रह्मवर्चस अपने मन को उस भूमिका में घसीटे लिए जा रहा है जिसमें पाशविक इच्छा आकाँक्षाएँ विरत हो जाती हैं और दिव्यता परिप्लावित करने वाली आकांक्षाएँ सजग हो उठती हैं। बुद्धि निर्णय करती है कि क्षणिक आवेशों के लिए, तुच्छ प्रलोभनों के लिए मानव जीवन जैसी उपलब्धि विनष्ट नहीं की जा सकती। इसका एक- एक पल आदर्शों की प्रतिष्ठापना के लिए खर्च किया जाना चाहिए। चित्त में उच्च निष्ठाएँ जमानी और सत्यम्- शिवम् कि ओर बढ़ चलने की उमंगें उत्पन्न करनी हैं। सविता देवता का तेजस अपनी अन्त:भूमिका में प्रवेश करके "अहं'' को परिष्कृत करता है। मरणधर्मा जीवधारियों की स्थिति से योजनों ऊपर उड़ा ले जाकर ईश्वर के सर्व समर्थ, परम पवित्र और सच्चिदानन्द स्वरूप में अवस्थित कर देता है।

🔵 गायत्री पुरश्चरणों के समय केवल जप ही नहीं किया जाता रहा, साथ ही भाव तरंगों से मन भी हिलोरें लेता रहा। कारण शरीर भावभूमि का अन्त:स्थल के आत्मबोध, आत्म दर्शन, आत्मानुभूति और आत्म विस्तार की अनुभूति अन्तर्ज्योति के रूप में अनुभव किया जाता रहा। लगा अपनी आत्मा परम तेजस्वी सविता देवता के प्रकाश में पतंगों के दीपक पर समर्पित होने की तरह विलीन हो गयी। अपना अस्तित्व समाप्त, उसकी स्थान पूर्ति परम तेजस् व्दारा। मैं समाप्त- सत् का आधिपत्य्। आत्मा और परमात्मा के अव्दैत मिलने की अनुभूति में ऐसे ब्रह्मानन्द की सरसता की क्षण- क्षण अनुभूति होती रही जिस पर संसार भर का समवेत विषयानन्द निछावर किया जा सकता है। 

🔴 जप के साथ स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में दिव्य प्रकाश की प्रतिष्ठापना का आरम्भ प्रयत्न पूर्वक धारण के रूप में की गई थी। पीछे वह स्वाभाविक प्रकृति बनी और अन्तत: प्रत्यक्ष अनुभूति बन गई। जितनी देर उपासना में बैठा गया- अपनी सत्ता के भीतर और बाहर परम तेजस्वी सविता की दिव्य ज्योति का सागर लहलहाता रहा और यही प्रतीत होता रहा कि हमारा अस्तित्व इस दिव्य ज्योति से ओतप्रोत हो रहा है। प्रकाश के अतिरिक्त अंतरंग और बहिरंग में और कुछ है ही नहीं। प्राण के हर स्फुरण में ज्योति स्फुल्लिंगों के अतिरिक्त कुछ बचा ही नहीं। इस अनुभूति ने कम से कम पूजा के समय की अनुभूति को दिव्य दर्शन अनुभव से ओतप्रोत बनाए ही रखा। साधना का प्राय: सारा समय इसी अनुभूति के साथ बीता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.3

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...