गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 33)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

🔴 धर्म-कर्म और विरक्ति भाव में रुचि होने पर भी भोग वासनायें उनका साथ नहीं छोड़ पातीं। विचार जब तक संस्कार नहीं बन जाते मानव-वृत्तियों में परिवर्तन नहीं ला सकते। संस्कार रूप भोग वासनाओं से छूट सकना तभी सम्भव होता है जब अखण्ड प्रयत्न द्वारा पूर्व संस्कारों को धूमिल बनाया जाये और वांछनीय विचारों का भावनात्मक अनुभूति के साथ, चिन्तन-मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कारों की रचना परमावश्यक है।

🔵 चरित्र मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। यही वह धुरी है, जिस पर मनुष्य का जीवन सुख-शान्ति और मान-सम्मान की अनुकूल दिशा अथवा दुःख-दारिद्रय तथा अशान्ति, असन्तोष की प्रतिकूल दिशा में गतिमान होता है। जिसने अपने चरित्र का निर्माण आदर्श रूप में कर लिया उसने मानो लौकिक सफलताओं के साथ पारलौकिक सुख-शान्ति की सम्भावनायें स्थिर कर लीं और जिसने अन्य नश्वर सम्पदाओं के माया-मोह में पकड़कर अपनी चारित्रिक सम्पदा की उपेक्षा कर दी उसने मानो लोक से लेकर परलोक तक के जीवन पथ में अपने लिए नारकीय प्रभाव प्रबन्ध कर लिया।

🔴 यदि सुख की इच्छा है तो चरित्र का निर्माण करिये। धन की कामना है तो आचरण ऊंचा करिये, स्वर्ग की वांछा है तो भी चरित्र को देवोपम बनाइये और यदि आत्मा, परमात्मा अथवा मोक्ष मुक्ति की जिज्ञासा है तो भी चरित्र को आदर्श एवं उदात्त बनाना होगा। जहां चरित्र है वहां सब कुछ है, जहां चरित्र नहीं वहां कुछ भी नहीं। भले ही देखने-सुनने के लिए भण्डार के भण्डार क्यों न भरे पड़े हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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