मंगलवार, 14 मार्च 2017

👉 धन व्यक्ति का नही सारी प्रजा का

🔵 नासिरुद्दीन दिल्ली की गद्दी पर बैठा, पर वह वैभव और ऐश्वर्य भी उसकी ईश्वर निष्ठा, सादगी, सिद्धांतप्रियता और सरलता को मिटा न सका। होता यह है कि जब किसी को कोई उच्चाधिकार मिलता है, तो भले ही कार्य प्रजा और समाज की सेवा और भलाई का हो, वह अपना स्वार्थ-साधन करने लगता है, अहंकारपूर्वक वर्गहित का ध्यान भूल जाता है।

🔴 उन सबके लिए नासिरुद्दीन का जीवन एक पाठ है। उससे शिक्षा मिलती है कि बडप्पन मनुष्य की आदतों, भावनाओं और सच्चाईपूर्वक कर्तव्य परायणता का है दर्प और स्वार्थ का, धन का नहीं।

🔵 नासिरुद्दीन गद्दी पर बैठे तब भी उनकी धर्मपत्नी को भोजन अपने हाथ से ही पकाना पडता था। राजा स्वयं उन्हीं के हाथों का भोजन करता। उस भोजन में न तो बहुत विविधता होती, न मिर्च मसाले। सीधा सरल औसत दर्जे का भोजन बनता और राज-परिवार इसे ही ग्रहण करता। यद्यपि राजकोष और धन की कमी न थी। नासिरुद्दीन चाहते तो राजसी ठाठ-बाट का भोजन भी पकवाते। दस बीस रसोईये भी रख लेना उनके लिए पलकें मारने की तरह सरल था, तो भी सरल सम्राट ने प्रदर्शन नहीं किया, अपने आपको भी सामान्य नागरिक जैसा ही प्रस्तुत किया। अपने काम वह स्वयं अपने हाथ से करता तो बेगम को क्यों न वैसा ही जीवन बिताना पडता?

🔴 सामान्य जीवन में जो कठिनाइयों रहती हैं, उनका अभ्यास उन्हें भी करना पडा इस से उन्हें प्रजा का यथार्थ हित समझने का अवसर मिला, प्रजा भी ऐसे नेक राजा से बडा स्नेह रखती संसार कैसा भी हो लोग आदर्श, सच्चे और ईमानदारी का सम्मान और प्रतिष्ठा करते हैं, भले ही वह छोटा आदमी क्यों न हो? अहंकारी और धूर्त लोग चाहे कितने ही वैभवशाली क्यों न हो, उन्हें हृदय से कोई सम्मान नहीं देता।

🔵 गर्मी के दिन थे। इन दिनो गर्मी तो होती ही है, लू भी चलती है, बेगम एक दिन भोजन बना रहीं थी, कि बाहर से हवा का झोंका आया, लपट उठीं और उससे उनका हाथ जल गया वे बहुत दुःखी हुई आँखें भर आईं, आँसू बहने लगे नासिरुद्दीन भोजन के लिये आये तो बेगम ने विनीत भाव से पूछा- ''मुझे अकेले सब काम करने पडते हैं, उससे बडी मुश्किल पडती है, आपके पास इतना सारा राज्यकोष और वैभव है, क्या हमारे लिये भोजन पकाने वालों की भी यवस्था नही कर सकते?

🔴 चिंतनशील नासिरुद्दीन गंभीर हो गया उसने कहा- बेगम आपकी इच्छा पूरी की जा सकती है, पर उसका एक ही उपाय है कि हम अपने सिद्धांतो से डिगे, बनावट और बेईमानदारी का जीवन जियें। यह धन जो तुम देखती हो, वह मेरा नहीं सारी प्रजा का है, मैं तो उसका मात्र व्यवस्थापक हूँ। व्यवस्थापक के लिए जितनी सुविधाएं और पारिश्रमिक चाहिए हम उतना ही लेते हैं अब आप ही बताइए अतिरिक्त व्यवस्था के लिए अतिरिक्त धन कहाँ से आए? फिजूलखर्ची न तो मेरे हित में है और न ही प्रजा के हित में फिर वैसी व्यवस्था कैसे की जा सकती है?

🔵 नासिरुद्दीन की दृढ़ता और सिद्धांतप्रियता के आगे बेगम को चुप रह जाना पड़ा। इससे वह असंतुष्ट नहीं वरन् पति से सच्चे देवत्व के दर्शन कर प्रसन्न ही हुई।

🔴 जब तक राजा रहा नासिरुद्दीन ने कभी भी वैभव का जीवन नहीं, बिताया। अपने अतिरिक्त व्यय की व्यवस्था वह अतिरिक्त परिश्रम से करता था। अवकाश के समय सिली हुई टोपियॉ, लिखी हुई कुरानों की बिक्री से जो धन मिलता था, नासिरुद्दीन उसे ही काम में लेता था। इस तरह उसने अधिकारी और प्रजा के बीच समन्वय का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 81, 82

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