मंगलवार, 14 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 36)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 अविचारी व्यक्ति कितने ही सुन्दर आचरण अथवा आडम्बर में छिपकर क्यों न रहे। उसकी अविचारिता उसके व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकती रहेगी।

🔵 नित्य प्रति के सामान्य जीवन का अनुभव इस बात का साक्षी है। बहुत बार हम ऐसे व्यक्तियों के सम्पर्क में आ जाते हैं जो सुन्दर वेश-भूषा के साथ-साथ सूरत-शकल से भी बुरे और भद्दे नहीं होते, तब भी उनको देख कर हृदय पर अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं होती। यदि हम यह जानते हैं कि हम बुरे आदमी नहीं हैं, और इस प्रतिक्रिया के पीछे हमारी विरोध भावना अथवा पक्षपाती दृष्टिकोण सक्रिय नहीं हैं, तो मानना पड़ेगा कि वे अच्छे विचार वाले नहीं हैं।

🔴 उनका हृदय उस प्रकार स्वच्छ नहीं है जिस प्रकार बाह्यवेष।  इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा व्यक्ति सम्पर्क में आ जाता है जिसका बाह्य-वेष न तो सुन्दर होता है और न उसका व्यक्तित्व ही आकर्षक होता है तब भी हमारा हृदय उससे मिलकर प्रसन्न हो उठता है, उससे आत्मीयता का अनुभव होता है। इसका अर्थ यही है कि वह आकर्षण बाह्य का नहीं अन्तर का है, जिसमें सद्भावनाओं तथा सद्विचारों के फूल खिले हुए हैं।

इस विचार प्रभाव को इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि जब एक सामान्य पथिक किसी ऐसे मार्ग से गुजरता है जहां पर अनेक मृगछौने खेल रहे हों, सुन्दर पक्षी कल्लोल कर रहे हों तो वे जीव उसे देखकर सतर्क भले हो जायें और उस अजनबी को विस्मय से देखने लगें किन्तु भयभीत कदापि नहीं होते। किन्तु यदि उसके स्थान पर जब कोई शिकारी अथवा गीदड़ आता है तो वे जीव भय से त्रस्त होकर भागने और चिल्लाने लगते हैं। वे दोनों ऊपर से देखने में एक जैसे मनुष्य ही होते हैं किन्तु विचार के अनुसार उनके व्यक्तित्व का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...