मंगलवार, 14 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 76)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 न जाने क्या रहस्य था कि हमें हमारे मार्गदर्शन ने उठाती आयु मे तपश्चर्या के कठोर प्रयोजन में ४० साल की उम्र पूरी हुई। हो सकता है वर्चस्व और नेतृत्व के अहंकार का महत्त्वाकाँक्षाओं और और प्रलोभनों मे ,, बह जाने का खतरा समझा गया हो। हो सकता है आन्तरिक अपरिपक्वता- आत्मिक बलिष्ठता पाये बिना कुछ बड़ा काम न बन पड़ने की आशंका की गई हो। हो सकता है महान कार्यों के लिए अत्यन्त आवश्यक संकल्प बल, धैर्य, साहस और सन्तुलन न रखा गया हो। जो हो अपनी उठती आयु उस साधना क्रम में बीत गई जिसकी चर्चा कई बार कर चुके थे।   

🔵 उस अवधि में सब कुछ सामान्य चला, असामान्य एक ही था हमारा गौ घृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीपक। पूजा की कोठरी में वह निरंतर जलता रहता। इस वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था?कुछ ठिक से नहीं कर सकते। गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश, अनुशासन सो अनुशासन, समर्पण सो समर्पण। एक बार जब ठोक- बजा लिया और समझ लिया की इसकी नाव पर बैठने पर डुबने का खतरा नहीं हैं तो  फिर आँख मुँदकर बैठ ही गये। फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से भी अधिक प्यारा होता है। अपनी अन्धश्रद्धा कहिए या अनुशासन प्रियता या जीवन की दिशा निर्धारित कर दी गई,कार्य पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये। अखण्ड दीपक की साधना- कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आती है। 

🔴 मार्गदर्शक पर विश्वास किया, उसे अपने आपको सौंप दिया, तो उखाड़- पछाड़ ,क्रिया- तर्क में सन्देह क्यों? वह अपने से बन नहीं पड़ा। जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्त्व है, इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पुरश्चरणों की पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो यह प्राणप्रिय बन गया। २४ वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था,पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा सो उसे आजीवन चालू रखा जायेगा। हम अज्ञातवास गए थे, अब अब फिर जा रहे है तो उसे धर्मपत्नी सँजोए रखेगी। यदि एकाकी रहे होते,पत्नी न होती तो और कुछ साधना न बन सकती थी।

🔵 अखण्ड दीपक सँजोए रखना  कठिन था कर्मचारी, शिष्य या दूसरे श्रद्धालु एवं आन्तरिक दृष्टि से दुर्बल लोग ऐसी दिव्य अग्नि को सँजोए नहीं रह सकते। अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते- बुझते रहते हैं,वे नाममात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रहे- इसका करण बाह्य सतर्कता नहीं, अन्तर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए, जिसे अक्षुण्य रखने में हमारी धर्मपत्नी ने असाधारण योगदान दिया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan

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