मंगलवार, 14 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 14)

🌹 आत्मबल से उभरी परिष्कृत प्रतिभा

🔵 अध्यात्मबल का संपादन कठिन नहीं वरन् सरल है। उसके लिये आत्मशोधन एवं लोकमंगल के क्रियाकलापों को जीवनचर्या का अंग बना लेने भर से काम चलता है। व्यक्तित्व में पैनापन और प्रखरता का समावेश इन्हीं दो आधारों पर बन पड़ता है। यह बन पड़े तो दैवी अनुग्रह अनायास बरसता है और आत्मबल अपने भीतर से ही प्रचुर परिमाण में उभर पड़ता है। केवट, शबरी, गिलहरी, रीछ-वानर ग्वाल-बाल जैसों की भौतिक सामर्थ्य स्वल्प थी, पर वे अपने में देवत्व की मात्रा बढ़ा लेने पर ही इतने मनस्वी बन सके, जिनकी चर्चा इतिहासकार आये दिन करते रहते हैं।  

🔴 सुग्रीव की विजय के पीछे उसकी निज की बलिष्ठता मात्र ही कारण नहीं हुई थी। नरसी मेहता ने अभीष्ट धन अपने व्यवसाय से नहीं कमाया था। अमृतसर का स्वर्णमंदिर किसी एक धनवान् की कृति नहीं है। इनके पीछे देवत्व का अदृश्य सहयोग भी सम्मिलित रहा है। ध्रुव को ब्रह्मांड के केंद्र बनने का श्रेय उसके तपोबल के सहारे ही संभव हुआ था। अगस्त्य का समुद्रपान और परशुराम द्वारा अपने कुल्हाड़े के बल पर लाखों-करोड़ों का जो ‘ब्रेन वाशिंग’ हुआ था, उसे किन्हीं वक्ताओं के धर्मोपदेश से कम नहीं कहा जा सकता।   

🔵 सतयुग, ऋषियुग का ही प्रकट रूप है। असुरता की अभिवृद्धि होते ही कलहयुग-कलियुग आ धमकता है। उच्चस्तरीय प्रतिभाओं का पौरुष जब कार्यक्षेत्र में उतरता है तो न केवल कुछ व्यक्तियों व कुछ प्रतिभाओं को वरन् समूचे वातावरण को ही उलट-पुलट कर रख देता है। धोबी की भट्ठी पर चढ़ने से मैले कपड़ों को सफाई से चमचमाते देखा गया है। भट्ठी में तपने के बाद मिट्टी मिला बेकार लोहा फौलाद स्तर का बनता और उसके द्वारा कुछ न कुछ कर दिखाने वाले यंत्र उपकरण बनते हैं। आत्मशक्ति की प्रखरता को इसी स्तर का बताया और पाया गया है।    
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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