मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

👉 पक्षपात किया जाए तो इस तरह

🔴 किसी ने आक्षेप लगाया संत विनोबा पर "विनोबा जी तो शत्रु का पक्ष लेने की बात कहते हैं।" विनोबा जी ने सुना और एक स्थान पर उसका स्पष्टीकरण भी दे दिया। उन्होंने बतलाया पक्ष न लिया जाए यह अच्छा है किन्तु यदि लेना पडे तो शत्रु का ही लेने योग्य है। मित्र का क्या पक्ष लिया जाए-वह तो अपना है ही। मित्र के पक्ष में तो बुद्धि सहज हो जाती? प्रयासपूर्वक शत्रु के पक्ष मे लगाने पर ही पक्षपात से आंशिक मुक्ति पाई जा सकती है।

🔵 समाधान बहुत प्रमाणिक तथा विवेकपूर्ण ढंग से किया गया है। संत विनोबा की बुद्धि तथा विवेक पर लोग लट्टू हो जाते है। होना भी चाहिए, किन्तु बुद्धि के केवल क्रियाशील होने से ही उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित नहीं होती, उसकी दिशा भी सही होनी चाहिए। विनोबा जी की बुद्धि को जो श्रेष्ठता प्राप्त थी, वह उसकी सही दिशा के कारण ही है। तीव्र बुद्धि के व्यक्ति तो समाज में और भी बहुत हैं। अपने बौद्धिक चमत्कारों से दुनिया को नित नई समस्याओं में डालने वाले कम नहीं हैं। बुद्धि की दिशा गलत होने पर के कारण न उसका समाज को लाभ मिल पाता हे और न उन्हें ही श्रेय।

🔴 इस प्रकार की दिशा बुद्धि को दिए जाने का श्रेय विनोबा अपनी माता को देते थे। सामान्य जीवन में सहज घटित एक घटना ने उनके अंदर वह अंकुर पैदा कर दिया, जो उन्हें आज नई-नई सूझ इस दिशा में देता था।

🔵 घटना उनके बचपन की है। उनके साथ बहुधा कोइ सबंधी या मित्र बालक भी उनके घर में रहा करता था। उस बालक को भी धर में विनोबा के समान ही सुविधाएँ थी। भोजन आदि भी साथ-साथ समान स्तर का मिलता था।

🔴 कभी-कभी घरों मे बासी भोजन यथा रहना भी स्वाभाविक है। उनकी माता भोजन फेंके जाने के विरुद्ध थीं। अस्तु वह भोजन मिल-जुलकर थोडा़-थोडा़ खा लिया जाता था। ऐसे अवसर पर माता विनोबा को बासी भोजन देकर दूसरे को ताजा खिलाने का प्रयास करती थी। विनोबा को इस पर कोई आंतरिक विरोध नहीं था, सहज सद्भावना का शिक्षण उन्हें प्रारभ से ही मिला था। किंतु परिहास में एक दिन उन्होंने माँ से कहा आपके मन में अभी भेद है।'' माँ प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देख उठी। विनोबा ने हँसते हुए कहा हाँ देखो न आप मुझे बासी भोजन देती है तथा अमुक साथी को ताजा।

🔵 माँ की उदारता को पक्षपात की संज्ञा देकर विनोबा ने परिहास किया था, किंतु माता ने उसे दूसरे ही ढंग से लिया। बोली बेटा तू ठीक कहता है। मानवीय दुर्बलताऐं मुझमें भी है। तू मुझे अपना बेटा दीखता है तथा अभ्यागत अतिथि। इसे ईश्वर रूप अतिथि मानकर सहज ही मेरे द्वारा यह पक्षपात का व्यवहार हो जाता है। तुझे बेटा मानने के कारण तरे प्रति अनेक प्रकार का स्नेह मन में उठता है। जब तुझे भी सामान्य दृष्टि से देख सकूँगी, तब पक्षपात की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

🔴 बात कहीं की कहीं पहुँच गई थी, पर विनोबा को प्रसन्नता हुई। माता का एक और उज्जवल पक्ष उनके सामने आया था। समाज के संतुलन तथा आध्यात्मिकता की पकड़ का महत्वपूर्ण सूत्र उन्हें मिल गया था। लोग संतुष्टि के प्रयास में असतुष्ट होते क्यों दिखाई दिया करते हैं ? इसके कारण की वह खोज करते थे। आज उन्हें उसका एक विशिष्ट पक्ष दिखा। पक्षपात मनुष्य के अंतःकरण को सहन नहीं होता। व्यक्ति अभाव स्वीकार कर लेता है, पक्षपात नहीं। अपने को पक्षपात से मुक्त अनुभव करने वाला अंतकरण ही संतोष का अनुभव करता है। संत विनोबा ने माता की शिक्षा गाँठ में बाँध ली। आज वही गुण विकसित होकर, समाज में व्यापक प्रभाव डाल रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 13, 14

1 टिप्पणी:

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