मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 11)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे

🔵 जिस तिस से सहारा पाने की भी समय कुसमय आवश्यकता पड़ सकती है, पर उसकी उपयोगिता उतनी ही स्वल्प है, जितनी संकट ग्रस्तों को कठिनाई से उबारने में कभी-कभी उदारचेताओं की सहानुभूति काम दे जाती है। उसी के सहारे जिन्दगी की लम्बी मञ्जिल को पार करना और बढ़ी चढ़ी सफलताओं के अनुदान-वरदान प्रस्तुत कर सकना सम्भव नहीं होता।

🔴 आज की अदृश्य किन्तु दो महती समस्याओं में से एक यह है कि लोग परावलम्बन के अभ्यस्त हो चले हैं। दूसरों का ऊटपटाँग अनुकरण करते ही उनसे बन पड़ता है। निजी विवेक इतना तक नहीं जागता कि स्वतन्त्र चिन्तन के सहारे जो उपयुक्त है, उसे अपनाने और जो अनुपयुक्त है, उसे बुहार फेंकने तक का साहस जुटा सकें। यह परावलम्बन यदि छोड़ते बन पड़े, तो मनुष्य का उपयुक्तता को अपनाने का साहस भीतर से ही उठ सकता है और ‘‘एकला चलो रे’’ का गीत गुनगुनाते हुए उपर्युक्त तीनों क्षेत्रों में निहाल कर सकने वाली सम्पदा उपार्जित कर सकता है।  

🔵 आज की सबसे बड़ी, सबसे भयावह समस्या एक ही है, मानवी चेतना का परावलम्बन, अन्त:स्फुरणा का मूर्छाग्रस्त होना, औचित्य को समझ न पाना और कँटीली झाड़ियों में भटक जाना। अगले दिन इस स्थिति से उबरने के हैं। उज्ज्वल भविष्य की समस्त सम्भावनाएँ इसी आधार पर विनिर्मित होंगी। अगले दिनों लोग दीन-हीन मनो-मलीन उद्विग्न-विक्षिप्त स्थिति में रहना स्वीकार न करेंगे। सभी आत्मावलम्बी होंगे और किसी एक पुरुषार्थ को अपनाकर ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी बन सकने में पूरी तरह सफल होंगे। वातावरण मनुष्य को बनाता है, यह उक्ति गये गुजरें लोगों पर ही लागू होती है। वास्तविकता यह है कि आत्मबल के धनी, अपनी सङ्कल्प-शक्ति और प्रतिभा के सहारे अभीष्ट वातावरण बना सकने में पूरी तरह सफल होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...