मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

👉 सन्धिकाल की विषमवेला में वरिष्ठों का दायित्व

🔵 मनःस्थिति की विपन्नता ने आज मनुष्य को जर्जर बनाकर रख दिया है। अवांछनीय प्रचलनों ने परिस्थितियों को अत्यन्त कष्टदायी बना दिया है। व्यक्ति मानवी गरिमा से गिरकर बहुत नीचे आ गया है। उसकी शालीनता सदाशयता न जाने कौन ले गया? समाज व्यवस्था की भी ऐसी ही दुर्गति हो रही है। सहकारिता सद्भावना की, वसुधैव कुटुम्बकम् की हिल-मिलकर रहने और हँस-बाँटकर खाने की प्रथा घटते-घटते लुप्तप्राय होती जा रही है। मनुष्य कलेवर में नर पशुओं और नर-पिशाचों के झुण्ड ही विचरण करते देखे जाते हैं। समाज को अन्धी भेड़ों का समूह अथवा भूत-पलीतों की चाण्डाल चौकड़ी जैसा ही कुछ नाम दिया जा सकता है।

🔴 ऐसी विपन्न-वेला में स्रष्टा एक ही नीति अपना सकता है- अवांछनीयता की गलाई-उत्कृष्टता की ढलाई। यही दो गतिविधियाँ हैं जो युगसन्धि की इस वेला में सम्पन्न होती देखी जा सकेंगी। अवांछनीयता को गलते-समाप्त होते भी देखा जा सकेगा, साथ ही दूसरा कार्य नवसृजन का भी चलता देखा जा सकेगा। इसे उज्ज्वल भविष्य की ढलाई कहा जाएगा। दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती अभी भी देखी जा सकती हैं, पूर्णता की स्थिति में अब तीव्र गति से सम्पन्न होती देखी जा सकेंगी। जब भी ऐसा परिवर्तन होता है, मूलतः प्रकृत्ति के सम्बन्ध में ही है, किन्तु उसकी चपेट में मनुष्य आये बिना नहीं रहता। रोग मारने में आखिर रोगी को भी कई प्रकार की व्यथाएँ चिकित्सा द्वारा पहुँच ही जाती हैं।

🔵 तीव्र एण्टीबायोटिक स्तर की दवाएँ यही तो करती हैं। उद्देश्य निर्दोष रहने पर भी कड़वी दवा खिलाने से लेकर सुई लगाने और शल्य क्रिया करने तक के कई कष्टकर कार्य चिकित्सक के हाथों ही होते रहते हैं। वैसा ही कुछ अवतारी सत्ता के हाथों अगले दिनों होने जा रहा है। इन शेष बचे वर्षों में मनःस्थिति उलटने में जहाँ अग्रगामी युगशिल्पी अपने मूर्धन्य कौशल का परिचय देंगे, वहाँ अदृश्य जगत् में हो रहे प्रकृति प्रवाह भी अपना काम करेंगे। वे परिवर्तन में सहायता करने के लिए गलाई-ढलाई में सहायक रहने के लिए ही प्रकट होगा, किन्तु उनके स्वरूप ज्वार-भाटे की तरह, अन्धड़-तूफान की तरह विचित्र ही नहीं भयावह भी होंगे। उनकी चपेट में गेहूँ के साथ घुन पिसने, सूखे के साथ गीला जलने जैसे दृश्य भी उपस्थित होंगे।

🔴 युगान्तरीय चेतना तूफानी परिवर्तन साथ लेकर आ रही है। दूसरी ओर अन्धकार को चुनौती देने वाला प्रभात भी उसी उषाकाल में अपने आगमन की जानकारी दे रहा है। इस युगसन्धि की वेला में आत्मकल्याण, लोकमंगल और ईश्वरीय अनुग्रह के त्रिविध वरदान उस साधना से उन सभी को सहज ही उपलब्ध हो सकते हैं, जो महाकाल ने विशिष्टों के लिए निर्धारित किए हैं। महानता के वरण का ठीक यही समय है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 19

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