मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 65)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 जो लोग अपने को शरीर मान बैठते हैं, इन्द्रिय तृप्ति तक अपना आनन्द सीमित कर लेते, वासना और तृष्णा कि पूर्ति ही जिनका जीवनोद्देश्य बन जाता है,उनके लिए पैसा, अमीरी, बड़प्पन,प्रशंसा, पदवी पाना ही सब कुछ हो सकता है। वे आत्म- कल्याण की बात भुला सकते हैं और लोभ- मोह की सुनहरी हथकड़ी- बेड़ी चावपूर्वक पहने रह सकते हैं। उनके लिए श्रेय पथ पर चलने की सुविधाजनक स्थिति न मिलने का बहाना  सही हो सकता है। अंत:करण की आकांक्षाएँ ही साधन जुटाती हैं। जब भौतिक सुख सम्पत्ति ही लक्ष्य बन गया, तो चेतना का सारा प्रयास उन्हें जुटाने में लगेगा। उपासना तो फिर हल्की सी खिलवाड़ रह जाती है। कर ली तो ठीक, न कर ली तो ठीक।

🔴 कौतूहल की दृष्टि से लोग देखा करते हैं कि लोग इनका थोड़ा तमाशा देख लें, कुछ मिलता है या नहीं- थोड़ी देर अनमनी तबियत से चमत्कार मिलने की दृष्टि से उल्टी- पुल्टी पूजा- पत्री चलाई तो उन पर विश्वास नहीं जमा, सो छूट गई, छूटनी भी थी। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में, जीवनोद्देश्य प्राप्त करने की तीव्र लगन के अभाव में कोई आत्मिक प्रगति नहीं कर सकता। यह सब तथ्य हमें अनायास ही विदित थे। सो शरीर यात्रा और परिवार व्यवस्था जमाये भर रहने के लिए जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक था उतना ही ध्यान उस ओर दिया। उन प्रयत्नों को मशीन का किराया भर चुकाने की दृष्टि से किया। अन्त:करण लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहा सो भौतिक प्रलोभनों और आकर्षणों में भटकने की कभी जरुरत नहीं हुई।

🔵 जब अपना स्वरूप आत्मा की स्थिति में होने लगा और अन्त:करण परमेश्वर का परम पवित्र निवास दीखने लगा तो चित्त अंतर्मुखी हो गया। सोचने का तरीका इतना भर सीमित रह गया कि परमात्मा के राजकुमार आत्मा को क्या करना, किस दिशा में चलना चाहिए? प्रश्न सरल थे और उत्तर भी सरल। केवल उत्कृष्ट जीवन जीना चाहिए और केवल आदर्शवादी कार्य- पद्धति अपनानी चाहिए। जो इस मार्ग पर चले नहीं, उन्हें बहुत डर लगता है कि यह रीति- नीति अपनाई तो बहुत संकट आवेगा और गरीबी, तंगी, भर्त्सना और कठिनाई सहनी पड़ेगी। मित्र शत्रु हो जायेंगे और घर वाले विरोध करेंगे, अपने को भी आरम्भ में ऐसा ही लगा और अनुभव हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2a

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...