मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

👉 काशीफल का दान

🔴 कटक (उडीसा) के समीप एक गाँव में एक सभा का आयोजन किया गया उसमें हजारों संभ्रांत नागरिक और आदिवासी एकत्रित थे। गाँधी जी को हिंदी में भाषण का अभ्यास था, किंतु इस आशंका से कि कही ऐसा न हो यह लोग हिंदी न समझ पायें उडिया अनुवाद का प्रबंध कर लिया गया था।

🔵 भाषण कुछ देर ही चला था कि भीड़ ने आग्रह किया गाँधी जी आप हिंदी में ही भाषण करे। सीधी-सच्ची बातें जो हृदय तक पहुँचती हैं, उनके लिए बनावट और शब्द विन्यास की क्या आवश्यकता आपकी सरल भाषा में जो माधुर्य छलकता है उसी से काम चल जाता है, दोहरा समय लगाने की आवश्यकता नहीं।

🔴 गाँधीजी की सत्योन्मुख आत्मा प्रफुल्ल हो उठी। उन्होंने अनुभव किया कि सत्य और निश्छल अंत:करण का मार्गदर्शन भाषा-प्रान्त के भेदभाव से कितने परे होते है ? आत्मा बुद्धि से नहीं हृदय से पहचानी जाती है। समाज सेवक जितना सहृदय और सच्चा होता है लोग उसे उतना ही चाहते हैं, फिर चाहे उसकी योग्यता नगण्य-सी क्यों न हो। आत्मिक तेजस्विता ही लोक-सेवा की सच्ची योग्यता है- यह मानकर वे भाषण हिंदी में करने लगे।

🔵 लोगों को भ्रम था कि गाँधी जी की वाणी उतना प्रभावित नही कर सकेगी पर उनकी भाव विह्वलता के साथ सब भाव-विह्वल होते गए। सामाजिक विषमता, राष्ट्रोद्धार और दलित वर्ग के उत्थान के लिए उनका एक-एक आग्रह श्रोताओं के हृदय में बैठता चला गया।

🔴 भाषण समाप्त हुआ तो गाँधी जी ने कहा- ''आप लोगों से हरिजन फंड के लिये कुछ धन मिलना चाहिए। हमारी सीधी सादी सामाजिक आवश्यकताएँ आप सबके पुण्य सहयोग से पूरी होनी है।'' गांधी जी के ऐसा कहते ही रुपये-पैसों की बौछार होने लगी, जिसके पास जो कुछ था देता चला गया।

🔵 एक आदिवासी लड़का भी उस सभा में उपस्थित था। अबोध बालक, पर आवश्यकता को समझने वाला बालक। जेब में हाथ डाला तो हाथ सीधा पार गया। एक भी पैसा तो उसके पास न था जो बापू की झोली में डाल देता किंतु भावनाओ का आवेग भी तो उसके सँभाले नहीं सँभल सका। जब सभी लोग लोक-मंगल के लिए अपने श्रद्धा-सुमन भेंट किए जा रहे हों, वह बालक भी चुप कैसे रह सकता था ?

🔴 भीड को पार कर घर की ओर भागता हुआ गया और एक कपडे मे छुपाए कोई वस्तु लेकर फिर दौडकर लौट आया। गाँधी जी के समीप पहुँचकर उसने वह वस्तु गांधी जी के हाथ मे सौंप दी। गाँधी ने कपडा हटाकर देखा-बडा-सा गोल-मटोल काशीफल था।

🔵 गाँधी जी ने उसे स्वीकार कर लिया। उस बच्चे की पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा-कहाँ से लाए यह काशीफल ?

🔴 ''मेरे छप्पर मे लगा था बापू।" लडके ने सरल भाव से कहा-हमने अपने दरवाजे पर इसकी बेल लगाई है, उसका ही फल है और तो मेरे पास कुछ नहीं है, ऐसा कहते हुए उसने दोनो जेबें खाली करके दिखा दी।

🔵 आँखें छलक आई भावनाओं के साधक की। उसने पूछा बेटे- आज फिर सब्जी किसकी खाओगे ?

🔴 ''आज नमक से खा लेंगे बापू! लोक-मंगल की आकांक्षा खाली हाथ न लौट जाए, इसलिये इसे स्वीकार कर लो।'' बच्चे ने साग्रह विनय की।

🔵 गांधी जी ने काशीफल भंडार में रखते हुए कहा-मेरे बच्चो! जब तक तुम्हारे भीतर त्याग और लोक-सेवा का भाव अक्षुण्ण है, तब तक अपने धर्म और अपनी संस्कृति को कोई दबाकर नहीं रख सकेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 56, 57

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 1)

देवियो! भाइयो!! 🔴 आप में से अधिकांश व्यक्ति सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ था, परन्तु व्याख्यान क्यों नहीं दिया? विशेष कारणवश व्याख्यान न दे...