मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 6)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?

🔴 बस यही मनुष्यता की दीक्षा और मनुष्यता की ऊपरी परिधि में प्रवेश करने का शुभारंभ है। इसी का नाम अपने यहाँ गायत्री मंत्र की दीक्षा है। ये दीक्षा आवश्यक मानी गई है और दीक्षा ली जानी चाहिए। लेकिन दीक्षा के लिए व्यक्ति का कोई उतना ज्यादा महत्त्व नहीं है। व्यक्ति जब दीक्षा देता है, अपने आप को व्यक्ति गुरु बनाता है और अपने शरीर के साथ में शिष्य के शरीर को जोड़ने लगता है, तो उसका नाम गुरूडम है। गुरुडम का कोई मूल्य नहीं है।

🔵 गुरुडम से नुकसान भी है। यदि व्यक्ति समर्थ नहीं है, शुद्ध और पवित्र नहीं है और निर्लोभ नहीं है और उसकी आत्मा उतनी ऊँची उठी हुई नहीं है, घटिया आदमी है; तब उसके साथ में सम्बन्ध मिला लिया जाए, तो वह शिष्य भी उसी तरह का घटिया होता हुआ चला जाएगा। गुरु का उत्तरदायित्त्व उठाना सामान्य काम नहीं है। गुुरु दूसरा भगवान् का स्वरूप है और भगवान् के प्रतीक रूप में सबसे श्रेष्ठ जो मनुष्य हैं, व्यक्तिगत रूप से सिर्फ उन्हें ही दीक्षा देनी चाहिए, अन्य व्यक्तियों को दीक्षा नहीं देनी चाहिए।   

🔴 उन्हें (दीक्षा देने वालों को) भगवान् के साथ सम्बन्ध मिला देने का काम करना चाहिए। विवाह सिर्फ उसी आदमी को करना चाहिए, जो अपनी बीबी को प्यार देने और उसके लिए रोटी जुटाने में समर्थ है। विवाह संस्कार तो कोई भी करा सकता है, पण्डित भी करा सकता है। दक्षिणा दे करके विवाह करा ले, बात खतम। लेकिन पण्डित जी कहने लगे कि इस लड़की से जो एम.ए. पास है और जो पीएच. डी. है, मैं ब्याह करूँगा।

🔵 लेकिन उसके लिए अपने  पास जवानी भी होनी चाहिए, पैसे भी होने चाहिए, अनेक बातें होनी चाहिए। अगर ये सब न हों, तो कोई लड़की कैसे ब्याह करने को तैयार हो जाएगी? दीक्षा को एक तरह का आध्यात्मिक विवाह ही कहते हैं। आध्यात्मिक विवाह करना हर आदमी के वश की बात नहीं है। बीबी का पालन करना, बच्चे पैदा करना और बीबी की रखवाली करना हरेक का काम है क्या? नहीं, हरेक का काम नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/8

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