सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

👉 धर्म एक और सनातन है

🔴 गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में थे। अफ्रीकियों के स्वत्वाधिकार के लिए उनका आंदोलन सफलतापूर्वक चल रहा था, ब्रिटिश सरकार के इशारे पर एक दिन मीर नामक एक पठान ने गाँधी जी पर हमला कर दिया, गॉधी जी गंभीर रूप से घायल हुए। मनुष्य का सत्य, सेवा और सच्ची धार्मिकता का मार्ग है ही ऐसा कि इसमें मनुष्य को सुविधाओं की अपेक्षा कष्ट ही अधिक उठाने पडते हैं।

🔵 पर इससे क्या उच्च आत्माएँ कभी अपने पथ से विचलित हो जाती है क्या? बुराई की शक्ति अपना काम बंद नही करती तो फिर भलाई की शक्ति तो सौगुनी अधिक है, वह हार क्यों मानने लगे गाँधी जी को स्वदेश लौटने का आग्रह किया गया पर वे न लौटे। घायल गाँधी जी पादरी जोसेफ डोक के मेहमान बने और कुछ ही दिनों मे यह संबध घनिष्टता में परिवर्तित हो गया।

🔴 पादरी जोसेफ डोक यद्यपि बैपटिस्ट पंथ के अनुयायी और धर्म-गुरु थे, तथापि गांधी जी के संपर्क से वे भारतीय धर्म और सस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हुए। वे धीरे-धीरे भारतीय स्वातंत्रता संग्राम का भी समर्थन करने लगे।

🔵 पादरी डोक के एक अंग्रेज मित्र ने उनसे आग्रह किया कि वे भारतीयों के प्रति इतना स्नेह और आदर भाव प्रदर्शित न करें अन्यथा जातीय कोप का भाजन बनना पड़ सकता है, इस पर डोक ने उत्तर दिया- मित्र क्या अपना धर्म-पीडितों और दुखियों की सेवा का समर्थन नहीं करता, क्या गिरे हुओं से ऊपर उठने मे मदद देना धर्म-सम्मत नही ? यदि ऐसा है तो मैं अपने धर्म का ही पालन कर रहा हूँ। भगवान् ईसा भी तो ऐसा ही करते हुए सूली पर चढे थे फिर मुझे घबराने की क्या आवश्यकता?

🔴 मित्र की आशंका सच निकली कुछ ही दिनों में गोरे उनके प्रतिरोधी बन गये और उन्हें तरह-तरह से सताने लगे। ब्रिटिश अखबार उनकी सार्वजनिक निंदा और अपमान करने से नहीं चूके थे, लेकिन इससे पादरी डोक की सिद्धांत-निष्ठा में कोई असर नही पडा़। बहुत सताए जाने पर भी वो भारतीयो का समर्थन भावना पूर्वक करते रहे।

🔵 गाँधी जी जहाँ उनके इस त्याग से प्रभावित थे, वही उन्हें इस बात का दुःख भी बहुत अधिक था वे पादरी डोक को उत्पीडित नहीं देखना चाहते थे, इसलिये जिस तरह एक मित्र अपने मित्र के प्रति वेदना रखता है। गाँधी जी भी उनके पास गए और बोले- आपको इन दिनो अपने जाति भाइयों से जो कष्ट उठाने पड रहे हैं उसके कारण हम भारतीयों की ओर से आपका आभार मानते हैं, पर आपके कष्ट हमसे नही देखे जाते। आप हमारा समर्थन बंद कर दें। परमात्मा हमारे साथ हैं यह लडाई भी हम लोग निपट लेगे।

🔴 इस पर पादरी डोक ने कहा मि० गाँधी आपने ही तो कहा था कि धर्म एक और सनातन है पीडित मानवता की सेवा।'' फिर यदि सांप्रदायिक सिद्धन्तों की अवहेलना करके मैं सच्चे धर्म का पालन करूँ तो इसमे दुख करने की क्या बात और फिर यह तो मैं स्वांतः सुखाय करता हूँ। मनुष्य धर्म की सेवा करते आत्मा को जो पुलक और प्रसन्नता होनी चाहिए, वह प्रसाद मुझे मिल रहा है, इसलिए वाह्य अडचनों, दुःखों और उत्पीडनों की मुझे किंचित भी परवाह नही।

🔵 पादरी डोक अंत तक भारतीयों का समर्थन करते रहे। उन जैसे महात्माओं के आशीर्वाद का फल है कि हम भारतीय आज अपने धर्म, आदर्श और सिद्धन्तों पर निष्कंटक चलने के लिए स्वतंत्र है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 40, 31

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