सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 58)

🌹 लक्षपूर्ति की प्रतीक्षा

🔵 आहार हलका हो जाने से नींद भी कम हो जाती है। फल तो अब दुर्लभ हैं पर शाकों से भी फलों वाली सात्विकता प्राप्त हो सकती है। यदि शाकाहार पर रहा जाय तो साधन के लिए चार पांच घंटे की नींद पर्याप्त हो जाती है।

🔴 जाड़े की रात लम्बी होती हैं। नींद जल्दी ही पूरी हो गई। आज चित्त कुछ चंचल था। यह साधना कब तक पूरी होगी? लक्ष कब तक प्राप्त होगा? सफलता कब तक मिलेगी? ऐसे-ऐसे विचार उठ रहे थे। विचारों की उलझन भी कैसी विचित्र है, जब उनका जंजाल उमड़ पड़ता है तो शान्ति की नाव डगमगाने लगती है। इस विचार प्रवाह में न भजन बन पड़ रहा था, न ध्यान लग रहा था। चित्त ऊबने लगा। इस ऊब को मिटाने के लिए कुटिया से निकला और बाहर टहलने लगा। आगे बढ़ने की इच्छा हुई। पैर चल पड़े। शीत तो अधिक था, पर गंगा माता की गोद में बैठने का आकर्षण भी कौन कम मधुर है, जिसके सामने शीत की परवा हो? तट से लगी हुई एक विशाल शिला जलधारा में काफी भीतर तक धंसी पड़ी थी। अपने बैठने का वही प्रिय स्थान था। कम्बल ओढ़ कर उसी पर जा बैठा। आकाश की ओर देखा तो तारों ने बताया कि अभी दो बजे हैं।

🔵 देर तक बैठा रहा तो झपकी आने लगी। गंगा का ‘कलकल हरहर’ शब्द भी मन को एकाग्र करने के लिये ऐसा ही है जैसे शरीर के लिए झूला-पालना! बच्चे को झूला पालने में डाल दिया जाय तो शरीर के साथ ही उसे नींद आने लगती है। जिस प्रदेश में इन दिनों यह शरीर है वहां का वातावरण इतना सौम्य है कि यह जलधारा का दिव्य कलरव ऐसा लगता है मानो वात्सल्यमयी माता लोरी सुना रही हो। चित्त एकाग्र होने के लिये, यह ध्वनि लहरी कलरव नादानुसंधान से किसी भी प्रकार कम नहीं है। मन को विश्राम मिला। चित्त शान्त हो गया। झपकी आने लगीं। लेटने को जी चाहा। पेट में घुटने लगाये। कम्बल ने ओढ़ने बिछाने के दोनों काम साध दिये। नींद के हलके झोंके आने आरम्भ हो गये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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