रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 अभेद आदर-निर्विकार न्याय

🔵 इस युग में भी जब कि बुद्धि-विकास तेजी से हो रहा है, लोगों में ऊँच-नीच, छूत-अछूत, छोटे-बड़े का भाव देखकर हर विचारशील व्यक्ति को कष्ट होता है। उस परिस्थिति में तो और भी जब कि सामाजिक न्याय के लिए भी पक्षपात होता है। साधारण कर्मचारी से लेकर बडे-बडे पदाधिकारी और न्यायाधीशों में भी इस तरह की प्रवंचना देखने मे आती है तो उन महापुरुषों की यादें उभर आती हैं, जिन्होंने कर्तव्यपरायणता से अपने पद को सम्मानित किया, आज की तरह उस पर कलंक का टीका नहीं लगाया।

🔴 बंबई हाईकोर्ट के जज गोंविद रानाडे को कौन नहीं जानता ? पर इसके लिए नहीं कि वे अंग्रेजी युग के सम्माननीय जज थे वरन इसलिये कि उन्होंने पद की अपेक्षा कर्तव्य पालन को उच्च माना और उसकी पूर्ति में कभी हिचक न होने दी।

🔵 एक बार की बात हैं- रानाडे साहब अपने कमरे में पुस्तक पढ़ रहे थे, तो उस समय कोई अत्यत दीन और वेषभूषा से दरिद्र व्यक्ति उनसे मिलने गया अफसरों के लिये इतना ही काफी होता है अपने पास से किसी को भगा देने के लिए। कोई अपना मित्र संबंधी, प्रियजन हो तो सरकारी काम की भी अवहेलना कर सकते है पर न्याय के लिए हर-आम की बात गौर से सुन लेना, अब शान के खिलाफ माना जाता है।

🔴 रानाडे इस दृष्टि से निर्विकार थे। उन्होंने अपने चपरासी से कहा-उस व्यक्ति को आदरपूर्वक भीतर ले आओ। कोइ छोटी जाति का आदमी था। नमस्कार कर एक ओर खडा हो गया। कहने लगा हुजूर मेरी एक प्रार्थना है।

🔵 "सो तो मैं सुनूँगा।" जज साहब ने सौम्य शब्दों में कहा- "पहले आप कुर्सी पर बैठिए।"

🔴 "हुजूर मैं छोटी जाति का आदमी हूँ आपके सामने कैसे बैठ जाऊ, यो ही खडे-खडे अर्ज कर देता हूं।"

🔵 रानाडे जानते थे, इनके साथ हर जगह उपेक्षापूर्ण बर्ताव होता है, इसीलिए वह यहाँ भी डर रहा है। उनके लिए यह बडा दुःख था कि मनुष्य-मनुष्य में भेद जताकर उसका अनादर करता है। परिस्थितियों में किसी को हीन स्थिति मिली तो इसका यह अर्थ नही होता है कि उन्हें दुतकारा जाए और सामाजिक न्याय से वंचित रखा जाए। भेद किया जाए तो हर व्यक्ति दूसरे से छोटा है। जब चाहे, जो चाहे जिसका अनादर कर सकता है। ऐसा होने लगे तो संसार में प्रेमा-आत्मीयता और आदर का लेशमात्र स्थान न बचे।

🔴 जज साहब ने उसे पहले आग्रहपूर्वक कुर्सी पर बैठाया और फिर अपनी बात कहने के लिए साहस बंधाया था।

🔵 बंबई नगरपालिका के विरुद्ध अभियोग था। साधारण व्यक्ति होने के कारण सुनवाई न हुई थी, वरन् उसे जहाँ गया डॉट- फटकार ही मिली थी। आजकल वैसा नही होता तो बहानेबाजी, रिश्वतखोरी की बाते चलती हैं दोनों एक-सी है। फिर जितना उपर बढो़ सुनवाई की संभावना भी उतनी ही मंद पड़ती जाती है।

🔴 जज साहब ने बात ध्यान से सुनी और कहा- "मैं सब कुछ आज ही ठीक कर दूँगा।" आश्वासन पाकर उस दीन जन की आँखें भर आईं। जज साहब ने उसी दिन उस बेचारे का वर्षों का रुका काम निबटाया। यह भी हिदायत दी कि किसी को निम्न वर्ग वाला, अशिक्षित या अछूत मानकर उपेक्षित और न्याय से वंचित न रखा जाए।

🔵 जज साहब की यह आदर्शवादिता यदि आज के पदाधिकारियों में होती तो भारतीय लोकतंत्र उजागर हो जाता।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 52, 53

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