रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 63)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 साधनात्मक जीवन की तीन सीढ़ियाँ हैं। तीनों पर चढ़ते हुए एक लंम्बी मंजिल पार कर ली गई। (१) मातृवत् परदारेषु (२) परद्रव्येषु लोष्ठवत् की मंजिल सरल थी, वह अपने- आप से सम्बन्धित थी। लड़ना अपने से था, संभालना अपने को था, तो पूर्व जन्मों के संस्कार और समर्थ गुरू की सहायता से इतना सब आसानी से बन गया। मन उतना ही दुराग्रही दुष्ट न था, जो कुमार्ग पर घसीटने की हिम्मत करता। यदा- कदा उसने इधर- उधर भटकने की कल्पना भर की। जब प्रतिरोध का डंडा जोर से सिर पर पड़ा ,, तो सहम गया और चुपचाप सही राह चलता रहा। मन से लड़ते, झगड़ते, पाप और पतन से भी बचा लिया गया।  

🔴 अब जबकि सभी खतरे टल गये तब संतोष की साँस ले सकते हैं। दास कबीर ने झीनी- झीनी बीनी चदरिया, जतन से ओढ़ी थी और बिना दाग- धब्बे ज्यों की त्यों वापिस कर दी। परमात्मा को अनेक धन्यवाद कि उसने  सही राह पर हमें चला दिया और उन्हीं पदचिन्हों को ढ़ूढ़ते तलाशते, उन्हीं आधारों को मजबूती के साथ पकड़े हुए उस स्थान तक पहुँच गये, जहाँ लुढ़कने और गिरने का खतरा नहीं रहता। 

🔵 अध्यात्म की कर्मकाण्डात्मक प्रक्रिया बहुत कठिन नहीं होती। संकल्प बल मजबूत हो, श्रद्धा और निष्ठा भी कम न पड़े तो मानसिक उव्दिग्नतानहीं होती और शांतिपूर्वक मन लगने लगता है। और उपासना के विधि- विधान गड़बड़ाए बिना अपने ढ़र्रे पर चलते रहते हैं। मामूली दुकानदार सारी जिन्दगी एक ही दुकान पर, एक ही ढर्रे से पूरी दिलचस्पी के साथ काट लेता है। न मन डूबता है न अरुचि होती है। पान- सिगरेट के  दुकानदार १२- १४ घण्टे अपने धन्धे को उत्साह और शान्ति के साथ आजीवन करते रहते हैं, तो हमें ६- ७ घण्टे प्रतिदिन की गायत्री साधना २४ वर्ष तक चलाने का संकल्प तोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ती। मन उनका उचटता है जो उपासना को पान- बीड़ी की खेती- बाड़ी का, मिठाई- हलवाई के धन्धे से भी कम लाभदायक समझते हैं। बेकार के अरुचिकर कामों में मन नहीं लगता

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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