रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 22)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हैल्थ’ का शाब्दिक अर्थ ‘शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना लिखा है। अर्थात् मस्तिष्क जितना पुष्ट रहता है शरीर उतना ही पुष्ट होगा और मस्तिष्क के पुष्ट होने का एक ही उपाय है ज्ञान वृद्धि। शास्त्रकारों ने भी ज्ञान वृद्धि को ही अमरता का साधन कहा है। भारतीय ऋषि-मुनियों का दीर्घजीवन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सभी ऋषि दीर्घ जीवी हुए हैं उनके जीवन क्रम में ज्ञानार्जन ही सबसे बड़ी विशेषता रही है। इसके लिए तो उन्होंने वैभव विलास का जीवन तक ठुकरा दिया था। वे निरन्तर अध्ययन में लगे रहते थे जिससे उनका नाड़ी संस्थान कभी शिथिल न होने पाता था और वे दो-दो, चार-चार सौ वर्ष तक हंसते-खेलते जीते रहते थे।

🔵 पुराणों के अध्ययन  से पता चलता है कि वशिष्ठ, विश्वामित्र, दुर्वासा, व्यास आदि की आयु कई-कई सौ वर्ष की थी। जामवन्त की कथा लगती कपोल कल्पित है पर अमेरिकी वैज्ञानिकों का कथन सत्य है तो उस कल्पना को भी निराधार नहीं कहा जा सकता है। कहते हैं जामवन्त बड़ा विद्वान था। वेद उपनिषद् उसे कण्ठस्थ थे वह निरन्तर पढ़ा ही करता था और इस स्वाध्यायशीलता के कारण ही उससे लम्बा जीवन प्राप्त किया था। वामन अवतार के समय वह युवक था। रामचन्द्र का अवतार हुआ तब यद्यपि उसका शरीर काफी वृद्ध हो गया था पर उसने रावण के साथ युद्ध में भाग लिया था। उसी जामवन्त के कृष्णावतार में भी उपस्थित होने का वर्णन आता है।

🔴 दूर की क्यों कहें ‘पेंटर मार्फेस’ ने ही अपने भारत के इतिहास में ‘नूमिस्देको गुआ’ नामक एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया है जो सन् 1566 ई. में 370 की आयु में मरा था। इस व्यक्ति के बारे में इतिहासकार ने लिखा है कि मृत्यु के समय भी उसे अतीत की घटनाएं इतनी स्पष्ट याद थीं जैसे अभी वह कल की बाते हों। यह व्यक्ति प्रतिदिन 6 घण्टे से कम नहीं पढ़ता था। डा. लेलार्ड कार्डेल लिखते हैं—‘‘मैंने शिकागो निवासिनी श्रीमती ल्यूसी जे. से भेंट की तब उनकी आयु 108 वर्ष की थी। मैं जब उनके पास गया तब वे पढ़ रही थीं। बात-चीत के दौरान पता चला कि उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज है वे प्रतिदिन नियमित रूप से पढ़ती है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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