रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (अंतिम भाग)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 समय को अत्यन्त दुरूह समझा जा रहा है और मान्यता बनती जा रही है कि यह बढ़ते हुए कदम मानवी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन करके रहेेंगे। क्या हम सब अगले ही दिनों सामूहिक आत्महत्या का यह विनाश आयोजित करके रहेंगे?      

🔴 स्थिति को कैसे बदला जाये? इसके सम्बन्ध में तरह तरह के उत्पादनों, उपकरणों, निर्धारणों की बात सोची जाती है। वैज्ञानिक, मनीषी, सत्ताधारी, शक्तिशाली, अपने-अपने ढंग से यह भी सोचते हैं कि प्रस्तुत अनर्थ को यदि सुसंरचना में बदला जा सके, तो इसकी तैयारी के लिए बड़े साधन, बड़े-बड़े आधार खड़े किये जाने चाहिए। ऐसी योजनाएँ भी आए दिन सुनने को मिलती हैं और जताई-बताई भी जाती है कि अधिक साधन सम्पन्न संसार विनिर्मित करने के लिए बड़े लोग कुछ बड़े कदम उठाने, बड़े विधान बनाने जा रहे हैं। इतने पर भी निराशा को हटाने में राई रत्ती भी सफलता मिलती दीख नहीं पड़ती, क्योंकि वस्तुत: मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। 

🔵 यदि मानसिकता को आदर्शवादी उत्कृष्टता के साथ न जोड़ा जा सका, तो स्थिति सुधरेगी, सुलझेगी नहीं, वरन् विपत्तियाँ और भी नजदीक आती, और भी रौद्र रूप धारण करती चली जायेंगी। समस्याओं का सामाधान भले ही आज हो या आज से हजार वर्ष बाद, पर उसका समाधान मात्र एक ही उपाय से सम्भव होगा, कि मन:स्थिति में संव्याप्त अवाञ्छनीयता को पूरी तरह बुहार फेंका जाये जो प्रस्तुत उलटे प्रवाह को अपनी प्रचण्ड शक्ति के सहारे उलटकर सीधा कर सके।    

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

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