शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 अध्यात्म का उपदेश

🔵 प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।

🔴 यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1961 जून Page 21

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...