शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 2)

🔴  मन का वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव, सफल सम्पन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता, तन्मयता के आधार पर मिले हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष को दूर रखे रहना नहीं चाहते। इस दुधारू गाय को, तुर्की घोड़े को पालने का जी सभी का होता है। पर वह हाथ आये तब न?

🔵  आमतौर से कामुकता, जिह्वा स्वाद, सैर-सपाटे विलास वैभव, यश, सम्मान पाने की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ होती हैं। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ाने उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दिखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गन्तव्य भी तो नहीं दीखता। मन को कहीं कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, सुहाये, मिलना चाहिए।

🔴 रुचियाँ बदलती रहती हैं या बदली जा सकती हैं छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। युवक होने पर अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगन लगती है। तरुण होने पर धन कमाने-गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े भजन करते और कथा सुनते हैं। बचपन में बढ़ी हुई स्फूर्ति हर घड़ी कुछ न कुछ करते रहने की उमंग करती रहती थी पर बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। यह परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी-नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌹 अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...