गुरुवार, 24 नवंबर 2016

👉 मन पर लगाम लगे तो कैसे? (भाग 1)

🔴 मन को वश में रखने के लिए अध्यात्म प्रसंगों में सदा कहा और दुहराया जाता है। पर यह नहीं बताया जाता कि यह किस प्रकार किया जाय? इसलिए ध्यान, प्राणायाम जैसी विधियाँ बताई जाती हैं। पर देखा गया है कि उन विधाओं को अपनाने पर भी मन एकाग्र नहीं होता, पकड़-पकड़ कर बिठाने पर भी मेंढक की तरह उछल जाता है। क्षण भर का अवसर मिलते ही कहीं से कहीं पहुँचता है। इस पकड़-धकड़ में प्रयत्नकर्ता ही थकता है। मन का तो स्वभाव ही ठहरा। वह पवन की तरह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। पखेरू की तरह उसकी उड़ते रहने जैसी आदत जो है। हिरन को पकड़कर बाँधना उसे हाथ-पाँव तोड़ लेने के लिए बाधित करता है।

🔵  मन रस की खोज से मारा मारा फिरता है। उसे उसी की लगन और ललक है। कस्तूरी के हिरन को उस गंध के प्रति अत्यधिक लगाव होता है उसी को खोजने के लिए पाने के लिए वह लालायित होता है। जिधर भी मुँह उठता है, उधर ही दौड़ पड़ता है। यह भाग दौड़ तब तक जारी रहती है जब तक कि उसे गंध के उद्गम का पता नहीं चल जाता।

🔴 मन को सरसता चाहिए। ऐसी स्थिति जिसमें रसास्वादन का अवसर मिले। आनन्द की अनुभूति हो। नीरस क्रिया-कलापों में उसे रुचि नहीं हो पाती इसलिए वह अपना अभीष्ट तलाशने दूसरी जगह चल पड़ता है। तितलियाँ, भौंरे जहाँ-तहाँ उड़ते फिरते हैं पर जब उन्हें सुगंध भरे फूल मिल जाते हैं तब शान्ति के साथ स्थिरतापूर्वक बैठ जाते हैं और प्रमुदित होकर समय गुजारते हैं फिर उन्हें उचटने उखड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। यहाँ बंधन उसके लिए कारगर होता है कि जिसकी तलाश है उसे उपलब्ध करा दिया जाय।

🔵  डोरी से जकड़ने पर तो पशु भी अपने हाथ-पैर तुड़ा लेते हैं। विवशता में ही कोई कैद में रहना स्वीकार करता है। हथकड़ी-बेड़ी बैरक, तालों, संतरी आदि की व्यवस्था न हो तो कोई कैदी जेल में रहना स्वीकार न करे। खिड़की खुलते ही तोता पिंजरे से निकल भागता है और फिर पीछे की ओर देखत तक नहीं। यही बात मन के संबंध में भी कही जा सकती है। उसे नीरसता पसंद नहीं, सहन नहीं। इसलिए उसे जिस तिस खूँटे में बाँधने पर भी स्थिरता अपनाते नहीं बनती। उसे उन्मुक्त आकाश के मनोरम दृश्य देखने का चाव जो है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
🌹 अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

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