सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 6) 3 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 अभाव, प्रतिकूलताएं, विपन्नताएं वस्तुतः अभिशाप उनके लिए हैं जो परिस्थितियों को ही सफलता असफलता का कारण मानते हैं। अन्यथा आत्म विश्वास एवं लगन के धनी ध्येय की प्रति दृढ़ व्यक्तियों के लिए तो वे वरदान सिद्ध होती हैं। भट्टी में तपने के बाद सोने में निखार आता है। प्रतिकूलताओं से जूझने से व्यक्तित्व निखरता और परिपक्व बनता है। गिने चुने अपवादों को छोड़कर विश्व के अधिकांशतः महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने पर यह पता चलता है कि वे अभावग्रस्त परिस्थितियों में पैदा हुए पले। पर उन्होंने जीवन की विषमताओं को वरदान माना संघर्षों को जीवन बनाने तथा पुरुषार्थ को जगाने का एक सशक्त माध्यम समझा, फलतः वे प्रतिकूलताओं को चीरते हुए सफलता के शिखर पर जा चढ़े। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियां मानवी विकास में बाधक नहीं बन सकतीं अवरोध प्रचण्ड पुरुषार्थ के समक्ष टिक नहीं सकते।

🔴 दार्शनिक सुकरात का जन्म एक मूर्तिकार के घर हुआ। उसकी मां दाई का काम करती थी माता-पिता के अनवरत श्रम से किसी प्रकार घर का खर्च चल जाता था कुछ ही दिनों बाद पिता की छत्र छाया उठ गयी। मां के साथ गरीबी के दिन व्यतीत करते हुए भी वह अध्ययन में लगा रहा। मेहनत मजदूरी करते हुए भी वह अपने अध्यवसाय में निरत रहा। घर का खर्च चलाने का भी अतिरिक्त दायित्व बाल्यावस्था में ही उसके ऊपर आ गया पर गरीबी उसके विकास में बाधक नहीं बन सकी और अपने पुरुषार्थ एवं मनोयोग से एक दिन वह दर्शन शास्त्र का प्रकाण्ड विद्वान बना।

🔵 वियतनाम के राष्ट्रपिता ‘होचीमिन्ह’ को बचपन में ही अपने माता-पिता से अलग होना पड़ा। बचपन से लेकर युवावस्था तक वे संघर्ष करते रहे। फ्रांसीसी शासन का विरोध करने के अपराध में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल से निकलते ही वियतनाम की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने लगे। इसके लिए उन्हें जेल में ही कितनी बार कठोर यातनाएं सहनी पड़ी पर अन्ततः अपने  ध्येय में सफल हुए। देश भक्ति के अनुपम त्याग के कारण उन्हें महात्मा गांधी की भांति राष्ट्रपिता का सम्मान मिला। शेक्सपियर की तुलना संस्कृत के महाकवि कालिदास से की जाती है। वह एक कसाई का बेटा था। परिवार की गाड़ी चलाने के लिए आरम्भ में उसे भी यही धन्धा करना पड़ा पर अपने पुरुषार्थ के कारण वह अंग्रेजी का सर्वश्रेष्ठ कवि तथा नाटककार बना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...