सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 11) 2 Jan

🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 कहा जाता है कि गायत्री का अधिकार ब्राह्मण वर्ग को है। कहीं-कहीं उसके द्विजातियों तक सीमित होने का उल्लेख है। इससे लगता है कि ब्राह्मणेत्तर अथवा द्विज वर्ग से बाहर के लोगों को—अस्वर्णों को गायत्री का अधिकार नहीं है।

🔵 यह शंका सर्वथा निर्मूल है। एक कारण तो यह है कि गायत्री ब्राह्मी शक्ति होने के कारण, उसका उपयोग करने का अधिकार, सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी आदि की तरह सभी को है। प्रतिबन्ध मनुष्यकृत वस्तुओं पर उसके मालिक लगा सकते हैं। ईश्वरीय निर्मित वस्तुएं सभी के लिए उपलब्ध रहती हैं। गायत्री सार्वभौम है—सर्वजनीन है। उस पर किसी धर्म, जाति, वंश, वर्ग का आधिपत्य नहीं है। हर वर्ग, वंश का व्यक्ति इस कल्पवृक्ष का आश्रय बिना किसी हिचक के ले सकता है।

🔴 गायत्री गुरु मन्त्र है। विद्याध्ययन के लिए छात्र जब गुरुकुल में प्रवेश करते थे, तो सर्व प्रथम उन्हीं गायत्री मन्त्र ही गुरु द्वारा दिया जाता था। विद्यार्थी सभी वर्णों के होते थे और सभी को गायत्री मन्त्र मिलता था। भारतीय संस्कृति का प्रधान प्रतीक शिखा है, जिसे बिना किसी वर्ण भेद के सभी हिन्दू समान रूप से धारण करते हैं। शिखा गायत्री का स्वरूप है। मस्तिष्क पर सद्विवेक का अनुशासन स्थापित करने वाली इस ध्वजा को गायत्री की प्रतिमा ही कह सकते हैं। शिखाधारी तो अनायास ही गायत्री का अधिकारी बना होता है।

🔵 प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था जन्म, वंश पर नहीं गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित थी। वर्ण बदलते रहते थे। वंश और वर्ण का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। उन दिनों की सामाजिक व्यवस्था में कुटिलता अपनाने और कुकर्म करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होता होगा और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते होंगे। ये बहिष्कृत लोग खुले हुए कैदियों की स्थिति में सुधरने तक अलग रखे, तिरष्कृत किये जाते होंगे। उसी सामाजिक वर्ण व्यवस्था में सम्भवतः उन अस्पृश्यों से गायत्री का अधिकार छिन जाता होगा। इसी स्थिति का उल्लेख अंत्यजों को गायत्री मन्त्र से वंचित करने के दंड-रूप में दिया जाता होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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