सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 12) 3 Jan

🌹गायत्री का जातिगत अधिकार

🔴 जो हो आज वैसे सामाजिक दंड की व्यवस्था नहीं रही। फिर कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का आधार भी नष्ट हो गया। ऐसी दशा में किसी वंश विशेष को अधिकारी—अनधिकारी ठहराने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। सभी मनुष्य भगवान् के पुत्र हैं। सभी भाई-भाई हैं। जन्म के आधार पर कोई ऊंच-नीच नहीं हो सकता। उत्कृष्टता-निकृष्टता का एकमात्र आधार मनुष्य के सत्कर्म, दुष्कर्म ही हो सकते हैं। इन तथ्यों के रहते किसी वंश के ही लोगों को गायत्री का अधिकारी ठहराने की बात अनर्गल है। गायत्री उपासना सभी वर्णों के—सभी धर्म सम्प्रदायों के लोग बिना किसी भेदभाव के कर सकते हैं।

🔵 गायत्री को ब्राह्मण वर्ण तक सीमित करने वाली बात तो और भी अधिक उपहासास्पद है। गायत्री विनियोग में इस महामंत्र का ऋषि विश्वामित्र कहे गये हैं। विश्वामित्र जन्मतः क्षत्रिय थे। उन्हें ही इस महामन्त्र का साक्षात्कार और रहस्योद्घाटन करने का श्रेय प्राप्त है। यदि जाति-वंश की दावेदारी का झंझट खड़ा होता हो तो उसमें क्षत्रिय वर्ण के लोग अपने उत्तराधिकार का दावा कर सकते हैं। ब्राह्मण तो तब भी हार जायेंगे।

🔴 ब्रह्मपरायण—उत्कृष्ट व्यक्तित्व वाले साधक गायत्री उपासना से अधिक उच्चस्तरीय लाभ उठा सकते हैं। इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए गायत्री को ब्राह्मण की कामधेनु कहा गया है। इस प्रतिपादन में मात्र उत्कृष्टता की विशिष्टता को महत्व दिया गया है। अन्य वर्ग के लोगों को उससे वंचित करने जैसा प्रतिबन्ध उसमें भी नहीं है।

🔵 प्राचीन प्रचलन, शास्त्र का निर्देश और न्याय-नीति के आधार पर गायत्री उपासना सर्वजनीन ही ठहरती है। जाति, वंश, देश, सम्प्रदाय के कारण सार्वभौम उपासना पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता। हर कोई प्रसन्नतापूर्वक इस महाशक्ति का अंचल पकड़ कर ऊंचा उठने और आगे बढ़ने का लाभ प्राप्त कर सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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