गुरुवार, 12 जनवरी 2017

👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 4

कमाना कठिन, गँवाना सरल

🔴 मित्रो! पच्चीस हजार रुपए कमाना कितना कठिन होता है, कितना जटिल होता है, आप सभी जानते हैं। इसी तरह जीवन को, व्यक्तित्व को बनाना, विकसित करना कितना कठिन, कितना जटिल है? यह उन लोगों से पूछिए जिन्होंने सारी जिन्दगी मेहनत- मशक्कत की और आखिर के दिनों में पंद्रह हजार रुपए का मकान बना पाए। देखिए साहब, अब हम मर रहे हैं, लेकिन हमने इतना तो कर लिया कि अपने बाल- बच्चों के लिए एक मकान बनाकर छोड़े जा रहे हैं। निज का मकान तो है। पंद्रह हजार रुपए बेटा क्या है? पंद्रह हजार रुपए हमारी सारी जिन्दगी की कीमत है। जिन्दगी की कीमत किसे कहते हैं? अपने व्यक्तित्व को बनाना, अपने जीवन को बनाना, अपनी जीवात्मा को महात्मा, देवता बनाना और परमात्मा बनाना, यह विकास कितना बड़ा हो सकता है? इसके लिए कितना संघर्ष करना चाहिए, कितनी मेहनत करनी चाहिए, कितना परिश्रम और कितना परिष्कार करना चाहिए।

🔵 अगर आपके मन में यह बात नहीं आई और आप यही कहते रहे कि सरल रास्ता बताइए, सस्ता रास्ता बताइए, तो मैं यह समझूँगा कि आप जिस चीज को बनाना चाहते हैं, असल में उसकी कीमत नहीं जानते। कीमत जानते होते तो आपने सरल रास्ता नहीं पूछा होता। आप इंग्लैण्ड जाना चाहते है? अच्छा साहब इंग्लैण्ड जाने के लिए छह हजार रुपए लाइए, आपको हवाई जहाज का टिकट दिलवाएँ। नहीं साहब, इतने पैसे तो नहीं खरच कर सकते। क्या करना चाहते हैं? सरल रास्ता बताइए इंग्लैण्ड जाने का।

🔴 इंग्लैण्ड जाने का सरल रास्ता जानना चाहते हैं? कैसा सरल रास्ता बताऊँ बेटे? बस गुरुजी ज्यादा से ज्यादा मैं छह नए पैसे खरच कर सकता हैं, पहुँचा दीजिए न। अच्छा ला छह नए पैसे। इंग्लैण्ड अभी चुटकी में पहुँचाता हूँ। ये देख हरिद्वार मैं बैठा था और पहुँच गया इंग्लैण्ड देख ये लिखा हुआ है इंग्लैण्ड। अरे महाराज जी, यह तो आप चालाकी की बात कहते हैं। अच्छा बेटे, तू क्या कर रहा था? तू चालाकी नहीं कर रहा था। नहीं महाराज जी, भगवान तक पहुँचा दीजिए, मुफ्त में अपनी सिद्धि से पहुँचा दीजिए। यहाँ पहुँचा दीजिए वहाँ पहुँचा दीजिए। पागल कहीं का, पहुँचा दे तुझे ज़हन्नुम में। तू कहीं नहीं जा सकता, जहाँ है वहीं बैठा रह।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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