गुरुवार, 12 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 21) 12 Jan

🌹 गायत्री शाप मोचन

🔴 लगता है मध्यकाल में जब चतुर धर्माध्यक्षों में अपना स्वतन्त्र मत चलाने की प्रतिस्पर्धा जोरों पर थी, तब उनने गायत्री की सर्वमान्य उपासना को निरस्त करके उसका स्थान अपनी प्रतिपादित उपासनाओं को दिलाने का प्रयत्न किया होगा। इसके लिए पूर्व मान्यता हटाने की बात मस्तिष्क में आई होगी। सीधा आक्रमण करने से सफलता की सम्भावना न देखकर बगल से हमला किया होगा। गायत्री की सर्वमान्य महत्ता को धूमिल करने के लिए, उसे शापित, कीलित होने के कारण निष्फल होने की बात कहकर लोगों में निराशा, अश्रद्धा उत्पन्न करने का प्रयत्न चला होगा और उस मनःस्थिति से लाभ उठा कर अपने सम्प्रदाय का गुरुमन्त्र लोगों के गले उतारा होगा।

🔵 इसके अतिरिक्त और कोई कारण समझ में नहीं, जिसके आधार पर गायत्री महाशक्ति के प्रमुख उपासकों द्वारा शाप देकर व्यर्थ कर दिये जाने जैसी ऊल-जुलूल बात कही जा सके। सूर्य को, बादलों को, पवन को, बिजली को, पृथ्वी को कौन शाप दे सकता है? इतना बड़ा शाप दे सकने की सामर्थ्य इस धरती के निवासियों की तो हो नहीं सकती। अस्तु, गायत्री को शाप लगने और उसके निष्फल होने की बात को किसी विकृत मस्तिष्क की उपज ही कहा जा सकता है। उसे मान्यता देने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। हर कोई बिना किसी शंका-कुशंका के गायत्री उपासना कर सकता है और उसके सत्परिणामों की आशा कर सकता है।

🔴 शाप लगने की बात को एक बुझौअल के रूप में अधिक से अधिक इतना ही महत्व दिया जा सकता है कि वशिष्ठ जैसे विशिष्ठ और विश्वामित्र जैसा विश्व-मानवता का परिपोषक व्यक्ति सहयोगी, मार्गदर्शक मिलने पर इस महान साधना के अधिक सफल होने की आशा है। जिसे ऐसा गुरु न मिलेगा उसे अंधेरे में टटोलने वाले की तरह असफल रह जाने की भी संभावना हो सकती है। गायत्री को गुरुमन्त्र कहा गया है। उसकी सफलता ब्रह्मविद्या में पारंगत वशिष्ठ स्तर के एवं तपश्चर्या की अग्निपरीक्षा में खरे उतरे हुए विश्वामित्र स्तर के गुरु मिल जाने पर सुनिश्चित होती है। अन्यथा शाप लगने और निष्फल जाने का भय बना ही रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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