गुरुवार, 12 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 20)

🌞  हिमालय में प्रवेश

आलू का भालू

🔵 कुहरा कुछ कम हुआ आठ बज रहे थे। सूर्य का प्रकाश भी दीखने लगा। घनी वृक्षा वली भी पीछे रह गई, भेड- बकरी चराने वाले भी सामने दिखाई दिये। हम लोगों ने सन्तोष की साँस ली। अपने को खतरे से बाहर अनुभव किया और सुस्ताने के लिए बैठ गये। इतने में कुली भी पीछे से आ पहुँचा। हम लोगों को घबराया हुआ देखकर वह कारण पूछने लगा। साथियों ने कहा- तुम्हारे बताये हुए भालुओं से भगवान् ने जान वचा दी, पर तुमने अच्छा धोखा दिया बजाय उपाय बताने के तुम खुद छिपे रहे।

🔴 कुली सकपकाया उसने समझा उन्हें कुछ भ्रम हो गया। हमलोगों ने उसके इशारे से भालू बताने की बात दुहराई तो वह सब बात समझ गया कि हम लोगो को क्या गलतफहमी हुई है। उसने कहा- झेलागाँव का आलू मशहूर बहुत बड़ा- बड़ा पैदा होता है, ऐसी फसल इधर किसी गाँव में नहीं होती वही बात मैंने अँगुली के इशारे से बताई थी। झाला का आलू कहा था आपने उसे भालू समझा। वह काले जानवर तो यहाँ की काली गायें हैं, जो दिन भर इसी तरह चरती फिरती हैं। कुहरे के कारण ही वे रीछ जैसी आपको दीखी। यहाँ भालू कहाँ होते हैं वे तो और ऊपर पाए जाते हैं आप व्यर्थ ही डरे। मैं तो टट्टी करने के लिए छोटे झरने के पास बैठ गया था। साथ होता तो आपका भ्रम उसी समय दूर कर देता।

🔵 हम लोग अपनी मूर्खता पर हँसे भी और शर्मिन्दा भी हुए। विशेषतया उस साथी को जिसने कुली की बात को गलत तरह समझा, खूब लताडा गया। भय मजाक में बदल गया। दिन भर उस बात की चर्चा रही। उस डर के समय में जिस- जिस ने जो- जो कहा था और किया था उसे चर्चा का विषय बनाकर सारे दिन आपस की छीटाकशी चुहलबाजी होती रही। सब एक दूसरे को अधिक डरा हुआ परेशान सिद्ध करने में रस  लेते। मंजिल आसानी से कट गई। मनोरंजन का अच्छा विषय रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/himalaya%20_me_pravesh/thande_pahar/aalo_ka_bhalu

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 6)

🔴 यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर...