गुरुवार, 12 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 22) 13 Jan

🌹 अशौच में प्रतिबंध

🔴 जन्म और मरण का सूतक तथा स्त्रियों का रजोदर्शन होने की अवधि को अस्पर्श जैसी स्थिति का माना जाता है। उन दिनों गायत्री उपासना भी बन्द रखने के लिए कहा जाता है। इसको औचित्य-अनौचित्य का विश्लेषण करने से पूर्व यह जान लेना चाहिए कि सूतक एवं रजोदर्शन के समय सम्बन्धित व्यक्तियों के प्रथक रखने का कारण उत्पन्न हुई अशुद्धि की छूत से अन्यों को बचाना है। साथ ही इन अव्यवस्था के दिनों में उन्हें शारीरिक, मानसिक श्रम से बचाना भी है। यही सभी बातें विशुद्ध रूप से स्वच्छता-नियमों के अन्तर्गत आती हैं। अस्तु प्रतिबन्ध भी उसी स्तर के होने चाहिए, जिससे अशुद्धता का विस्तार न होने पाये। विपन्न स्थितियों में फंसे हुए व्यक्तियों पर से यथासम्भव शारीरिक, मानसिक दबाव कम करना इन प्रतिबन्धों का मूलभूत उद्देश्य है।

🔵 भावनात्मक उपासना क्रम इन अशुद्धि के दिनों में भी जारी रखा जा सकता है। विपन्नता की स्थिति में ईश्वर की शरणागति, उसकी उपासनात्मक समीपता हर दृष्टि से उत्तम है। उन दिनों यदि प्रचलित छूत परम्परा को निभाना हो तो इतना ही पर्याप्त है कि पूजा उपकरणों का स्पर्श न किया जाय। देवपूजा का विधान-कृत्य न किया जाय। मानसिक उपासना में किसी भी स्थिति में कोई प्रतिबन्ध नहीं है। मुंह बन्द करके—बिना माला का उपयोग किये, मानसिक, जप, ध्यान इन दिनों भी जारी रखा जा सकता है। इससे अशुद्धि का भाव हलका होने में भी सहायता मिलती है।

🔴 सूतक किसको लगा, किसको नहीं लगा, इसका निर्णय इसी आधार पर किया जा सकता है कि जिस घर में बच्चे का जन्म या किसी का मरण हुआ है, उसमें निवास करने वाले प्रायः सभी लोगों को सूतक लगा हुआ माना जाय। वे भले ही अपने जाति-गोत्र के हों या नहीं। पर उस घर से अन्यत्र रहने वाले—निरन्तर सम्पर्क में न आने वालों पर सूतक का कोई प्रभाव नहीं हो सकता, भले ही वे एक कुटुम्ब-परम्परा या वंश, कुल के क्यों न हों। वस्तुतः सूतक एक प्रकार की अशुद्धि-जन्य छूत है, जिसमें संक्रामक रोगों की तरह सम्पर्क में आने वालों को लगने की बात सोची जा सकती है यों अस्पतालों में भी छूत या अशुद्धि का वातावरण रहता है, पर सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों अथवा साधनों को उससे बचाने की सतर्कता रखने पर भी सम्पर्क और सामंजस्य बना ही रहता है। इतना भर होता है कि अशुद्धि के सम्पर्क के समय विशेष सतर्कता रखी जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...