सोमवार, 9 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 13) 10 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 देखा गया है कि जिन आशंकाओं से त्रस्त होकर चिन्तित रहा जाता है उनमें से अधिकांश निराधार ही हैं। इस सन्दर्भ में जर्मन वैज्ञानिकों द्वारा किया गया एक सर्वेक्षण बहुत महत्वपूर्ण है। वहां के मनःशास्त्रियों के एक दल ने जनवरी सन् 1979 में चिन्तातुर लोगों की पड़ताल के लिए एक प्रश्नावली तैयार की और उसे एक प्रसिद्ध पत्रिका में इस आग्रह के साथ प्रकाशित किया कि पाठक उसके उत्तर दें। करीब पांच हजार पाठकों ने उत्तर दिये। इन उत्तरों का विश्लेषण किया गया। और उनसे जो निष्कर्ष प्राप्त हुए उनके अनुसार 40 प्रतिशत व्यक्तियों की चिन्ता ऐसी समस्याओं को लेकर थी, जिनकी केवल आशंका थी, वे सामने नहीं आई थीं।

🔴 30 प्रतिशत समस्यायें ऐसी थीं जिनके कारण बहुत मामूली से और उन्हें थोड़ी सी सूझबूझ से सुलझाया जा सकता था। 12 प्रतिशत व्यक्तियों की चिन्तायें स्वास्थ्य सम्बन्धी थीं और वह भी ऐसी नहीं जो उपचार से ठीक न हो सकें। 10 प्रतिशत समस्यायें ऐसी थीं जिनके लिए दौड़-धूप करना, दूसरों का सहयोग लेना और थोड़ी परेशानी उठाना आवश्यक प्रतीत हुआ। केवल 8 प्रतिशत चिन्तायें ही ऐसी थीं, जिन्हें कुछ वजनदार कहा जा सकता था और जिन्हें पूरी तरह हल न किया जा सका तो उनके कारण कुछ हानि उठाने की सम्भावना विद्यमान थी।

🔵 यह तो हुआ चिन्ताओं का विश्लेषण। अधिकांश व्यक्ति ऐसे कारणों से चिन्तित रहते हैं जो वास्तव में कोई कारण नहीं होते। उनके कारणों को देखकर यही कहा जा सकता है कि उन्हें चिन्तित रहने की आदत है। हालांकि चिन्ता से किसी समस्या का, वास्तव में कोई समस्या है तो भी समाधान नहीं होता। देखा गया है कि चिंताग्रस्त रहने वाले व्यक्ति निश्चिन्त व्यक्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक घाटे में रहते हैं। निश्चिन्त रहने वाले, मन-मौजी और मस्त लोगों की नियत समय पर ही समस्या का सामना करना पड़ता है, जबकि चिन्तातुर लोग बहुत पहले से ही मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं और हड़बड़ी के कारण अपना अच्छा स्वास्थ्य भी गंवा बैठते हैं। मस्तिष्क जितना भी अधिक समस्याओं से उलझा रहेगा, उतना ही वह समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ हो जायेगा। क्रोधी, आवेश, ग्रस्त, आक्रोश भरे हुए दिमाग एक प्रकार से विक्षिप्त जैसे हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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