सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 58)

🌹 राजनीति और सच्चरित्रता

🔴 आज की परिस्थितियों में शासन सत्ता की शक्ति बहुत अधिक है। इसलिये उत्तरदायित्व भी उसी पर अधिक है। राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान और पतन में भी शासन-तंत्र अपनी नीतियों के कारण बहुत कुछ सहायक अथवा बाधक हो सकता है। नीचे कुछ ऐसे सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं जिनके आधार पर राजनीति के क्षेत्र से चरित्र निर्माण की दिशा में बहुत काम हो सकता है। हम लोग आज की प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लेते पर एक मतदाता और राष्ट्र के उत्तरदायी नागरिक होने के नाते इतना कर्तव्य तो है ही कि शासन तंत्र में आवश्यक उत्कृष्टता लाने के लिए प्रयत्न करें।

🔵 जो लोग आज चुने हुए हैं उन तक यह विचार पहुंचाए जाएं और जो आगे चुने जाएं उन्हें इन विचारों की उपयोगिता समझाई जाय। चुने हुए लोगों का बहुमत तो इस दिशा में बहुत कुछ कर सकता है। अल्प मत के लोग भी बहुमत को प्रभावित तो कर ही सकते हैं। जन आन्दोलन के रूप में यह विचारधारा यदि सरकार तक पहुंचाई जाय तो उसे भी इस ओर ध्यान देने और आवश्यक सुधार करने का अवसर मिलेगा। हमें रचनात्मक प्रयत्न करने चाहिये और शासन में चरित्र-निर्माण के उपयुक्त वातावरण रहे इसके लिये प्रयत्न करते रहना ही चाहिए।

🔴 नीचे कुछ विचार प्रस्तुत हैं। इनके अतिरिक्त तथा विकल्प में भी अनेक विचार हो सकते हैं जिनके आधार पर राष्ट्र का चारित्रिक विकास हो सके। उनको भी सामने लाना चाहिए।

🔵 87. गीता के माध्यम से जनजागरण— जिस प्रकार भागवत् कथा सप्ताहों के धार्मिक अनुष्ठान होते हैं उसी प्रकार गीता कथा सप्ताहों के माध्यम से जन जागरण के आयोजन किये जायें। युग-निर्माण योजना के अन्तर्गत जिस आर्ष-विचारधारा का प्रतिपादन है वह गीता में समग्र रूप से विद्यमान हैं। मोह-ग्रस्त अर्जुन को जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने गीता का सन्देश सुनाकर उसे कर्तव्य पथ पर संलग्न किया था उसी प्रकार प्रस्तुत भारत को जागृत करने के लिये जन-जीवन में गीता ज्ञान का प्रवेश कराया जाना चाहिए।

🔴 इस प्रकार गीता प्रवचनों के प्रशिक्षण के लिये एक विशेष योजना तैयार की गई है। गीता श्लोकों से संगति रखने वाली रामायण की चौपाइयों में इतिहास पुराणों की कथाओं का समावेश करके ऐसी पुस्तकें तैयार की गई हैं जिनके माध्यम से गीता की कथा को बाल, वृद्ध, नर, नारी, शिक्षित, अशिक्षित सभी के लिए आकर्षक, प्रबोधक एवं हृदयस्पर्शी बनाया जा सकता है। राधेश्याम तर्ज पर गीता का ऐसा पद्यानुवाद भी छापा गया है जिसे कीर्तन भजन की तरह गाया जा सकता है। आयोजनों में भाग लेने वाले व्यक्ति दो भागों में विभक्त होकर बारी-बारी इन पद्यानुवादों का सामूहिक पाठ करें तो वह गीता परायण बहुत ही आकर्षक बन सकता है। किस श्लोक के साथ किस युग-निर्माण सिद्धान्त का समावेश किया जाय और उसका प्रतिपादन किस प्रकार हो यह विधान इस गीता सप्ताह साहित्य में समाविष्ट कर दिया गया है। ऐसे प्रवचन कर्ताओं को व्यवहारिक शिक्षा देने के लिए मथुरा में एक एक महीने के शिक्षण शिविर भी होते हैं, जिनमें प्रशिक्षण प्राप्त कर गीता के माध्यम से जन-जागरण के लिये नई पीढ़ी के नये प्रवचनकर्त्ता—कथा-व्यास तैयार किये जा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...