सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 5) 27 Dec

🌹 स्नान और उसकी अनिवार्यता

🔴 रुग्णता, दुर्बलता से ग्रसित व्यक्ति स्नान की सुविधा न होने पर हाथ-पर, मुंह धोकर काम चला सकते हैं। गीले तौलिये से शरीर को पोंछ लेना भी आधा स्नान माना जाता है। वस्त्र धुले न हों तो ऊनी कपड़े पहन कर यह समझा जा सकता है कि उनके धुले न होने पर भी काम चल सकता है। यों मैल और पसीना तो ऊन को भी स्पर्श करता है और उन्हें भी धोने की या धूप में सुखाने की आवश्यकता पड़ती है। पर चूंकि उनके बाल गन्दगी को अपने अन्दर नहीं सोखते वह बाहर ही चिपकी रह जाती है।

🔵 इस दृष्टि से उसमें अशुद्धि का सम्पर्क कम होने के कारण बिना धुले होने पर भी ऊनी कपड़े पवित्र माने जाते हैं। यो स्वच्छता की दृष्टि से वे भी ऐसे नहीं होते कि बिना धुले होने पर भी सदा प्रयुक्त किये जाते और स्वच्छ माने जाते रहें। इसलिए इतना ही कहा जा सकता है कि व्यक्ति की असुविधा को ध्यान में रखते हुए शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता के सम्बन्ध में उतनी ही छूट देनी चाहिए जिसके बिना काम न चलता हो। अश्रद्धा, उपेक्षा, आलस्य, प्रमाद वश स्वच्छता को अनावश्यक मानना और ऐसे ही मनमानी करना उचित नहीं।

🔴 रेशमी वस्त्रों के सम्बन्ध में भी ऐसी ही मान्यता है कि उन्हें धोने की आवश्यकता नहीं। वे बिना धोये ही शुद्ध होते हैं यह मान्यता गलत है। सूत जितनी सोखने की शक्ति न होने से अपेक्षाकृत उसमें अशुद्धि का प्रवेश कम होता है, यह तो माना जा सकता है पर उसे सदा सर्वदा के लिए पवित्र मान लिया जाय और धोया ही न जाय, यह गलत है। धोने के समय को सूती कपड़े की अपेक्षा कुछ अधिक किया जा सकता है, इतना भर ही माना जाना चाहिए। धोया उसे भी जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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