सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 46) 27 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 मधुर भाषण, प्रसन्न रहना, दूसरों को प्रसन्न रखना आवश्यक है और इन सबसे अधिक आवश्यक यह है कि परिवार का खर्च चलाने के लिये ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक पैसा कमाया जाय। अनुचित रूप से कमाया हुआ अन्न सब की मन बुद्धि को दूषित करता है और फिर वे दोष नाना प्रकार के कलह, दुर्भाव और दुर्गुणों के रूप में प्रकट होते हैं। ईमानदारी से कमाये हुए अन्न से ऐसा सात्विक रक्त बनता है कि उससे शारीरिक और मानसिक स्वस्थता एवं सात्विकता अपने आप प्रचुर परिमाण में प्राप्त होती है और उसके आधार पर बिना अधिक परिश्रम के सद्भाव बढ़ते रहते हैं।

🔴 गृहस्थ योगी का चाहिये कि अपने परिवार को सेवा-क्षेत्र बनावे। परिजनों को ईश्वर की प्रतिमूर्तियां समझकर उनकी सेवा में दत्तचित्त रहे, उन्हें भीतरी और बाहरी स्वच्छता से समन्वित करके सुशोभित बनावे। इस प्रकार अपनी सेवा-वृत्ति और परमार्थ-भावना का जो नित्य पोषण करता है, उसकी अन्तःचेतना वैसी ही पवित्र हो जाती है जैसे अन्य योग साधकों की। गृहस्थ योगी को वही सद्गति उपलब्ध होती है जिसे अन्य योगी प्राप्त करते हैं।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 लक्ष्मीजी का निवास

🔶 एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ!! 🔷 सेठ ...