शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 30)

🔵 हम शव को फूलों से ढकते हैं किन्तु शव तो शव ही है। अत: संसार जिसे महान् कहता है अमृतपुत्र को गहराई से उनका अध्ययन करने दो। क्योंकि अत्यन्त कायिक ओर भौतिक होने के कारण भीतर यह सड़ा हुआ दुर्गन्धयुक्त ही है। संसार के नाशवान पदार्थ तथा उनके आकर्षणों से कोई संबंध न रखो। शरीर जिन मुखौटों से अपने दोष ढकता है उन्हें झाडू डालो। उस अन्तर्ज्ञान मैं प्रवेश करो जहाँ तुम यह जान लेते हो कि तुम इन नाशवान वस्तुओं के बने नहीं हो। तुम आत्मा हो। जान लो, साम्राज्यों के उत्थान पतन, संस्कृति और सभ्यताओं की प्रवृत्तियों का, उच्च आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। समझ लो, वह जो अदृश्य हैं वही महान् है, वस्तुत: वही स्पृहणीय है।

🔵 अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलीनताओं को निकाल फेंकी। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है।

🔴 यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय- लिप्साओं में व्यस्त रही और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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