सोमवार, 13 अगस्त 2018

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔷 “संसार में विवाह की भिन्न-भिन्न जितनी प्रथाऐं प्रचलित हैं, उनमें वैदिक पद्धति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। वैदिक पद्धति की विशेषता यह है कि इस पद्धति में अन्य पद्धतियों की तरह विवाह कोई व्यापारिक समझौता (कांट्रैक्ट) नहीं है, किन्तु ही एक पवित्र आत्मिक सम्बन्ध है, जो पति-पत्नी के बीच इसलिए होता है कि वे दोनों मिलकर संसार को यथा सम्भव पहले से अधिक सुखी बनाने का यत्न करें। उपनिषद् में एक जगह अलंकार के एंगल से गृहस्थ शरीर को उतना ही बतलाया है जितना स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर होते हैं। जब उसके दो भाग किये गये तो पति और पत्नी हुए। इसका स्पष्ट भाव यह है कि जिस प्रकार एक दाने के दो दल (दालें) अथवा एक सीप के दो अर्द्ध भाग बराबर-बराबर होते हैं, उसी प्रकार पति और पत्नी में समता होनी चाहिए, तभी वे गृहस्थाश्रम को अच्छा और गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बना सकते है।”

✍🏻 नारायण स्वामी
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...