सोमवार, 13 अगस्त 2018

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 2)

🔷 सात्विक अहंकार को दूर कर सकना बड़ा कठिन होता है, क्योंकि उसका सम्बन्ध ज्ञान और आनन्द से होता है और उसकी बुराई मनुष्य को किसी प्रकार दिखलाई नहीं देती। उदाहरण के लिये अर्जुन जब शस्त्रास्त्रों से सजकर युद्ध के लिये संग्राम भूमि में आये तो अपने सम्बन्धियों, आचार्य, पितामह, भाई, भतीजों आदि को लड़ने के लिये सामने खड़े देखकर व्याकुल हो उठे और धनुष बाण को हाथ से रखकर भगवान कृष्णा से कहने लगे-

गुरुन हत्वाहि महानुभावान्, श्रेयोभोक्तूं भैक्ष्यमपीह लोके।
हस्वार्थ कामास्तु गुरुनिहैव, भुँजाय भोगान्न् रुधिर प्रदिग्धान्॥

🔶 अर्थात्- “अपने गुरुजनों, पितामह आदि श्रेष्ठजनों की हत्या करने से तो यही अच्छा है कि भिक्षा माँगकर पेट भर लिया जाय। यदि हम इन महान पुरुषों को मारेंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि हम उनके रक्त में सने भोगों का उपयोग कर रहे है।’ अर्जुन के इस कथन को कोई साँसारिक मनुष्य अनुचित नहीं कह सकता, वरन् इससे उसके हृदय की उदार भावना ही प्रकट होती है। आगे चल कर उसने यहाँ तक कह दिया-

यदि मामप्रतीकारमशस्त्र शस्त्र पाणयः।
धार्तराष्ट्राः राणे हन्युस्तन्में क्षेमकरम् भवेत्॥

🔷 अर्थात्- अगर मुझे युद्ध से उदासीन और निःशस्त्र देख कर दुर्योधन के पक्ष वाले आक्रमण करके मार डालें तो भी इस युद्ध से मैं उसे अपने लिये आत्म कल्याणकारी ही मानूँगा।” अर्जुन की यह भावना परम उद्धान्त होने पर भी सात्विक अहंकार थी। वह समझता था कि मेरे जैसे ज्ञान सम्पन्न और कर्तव्य परायण व्यक्ति के लिये इस स्वार्थ-प्रधान कार्य को करना बड़ा वर्हिति और अपयश करने वाला होगा। उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि भगवान की लीला बड़ी विचित्र होती है जिसका रहस्य बड़े से बड़े ज्ञानी भी नहीं समझ सकते। वे किसी समय मनुष्य से जान बूझ कर ऐसा कार्य भी करा डालते है जो प्रत्यक्ष में बड़ा पाप पूर्ण जान पड़ता हो। इसी लिये अन्त में भगवान को दिव्य चक्षु प्रदान करके अर्जुन का मोह और सात्विक अहंकार दूर करना पड़ा उन्होंने उसे समझा दिया कि पाप-पुण्य धर्म-अधर्म की धारणा साधारण मनुष्यों के लिये है, जो कामना या स्वार्थ की दृष्टि से कार्य करते हैं। अपने को भगवान के हाथ में देकर निष्काम भाव से कर्म करने पर पाप-पुण्य का प्रश्न ही नहीं रह जाता। भगवान और उनके सच्चे भक्त सब प्रकार के द्वन्द्वों से परे रहते है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 9

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...