मंगलवार, 29 मई 2018

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (अन्तिम भाग)

🔷 हमें अपने जीवनयापन के सामान्य कार्यक्रम से ईसाइयत को ढूंढ़कर निकालना होगा और उसके स्थान पर भारतीयता की प्रतिष्ठापना करनी होगी। अंग्रेज चले गये अब अंग्रेजियत की गुलामी क्यों की जाय? हैट पैन्ट में क्या खूबसूरती है जो हमारे धोती कुर्ते में नहीं है। उसे हम स्वयं पहनें और बच्चों को पहनावें। अंग्रेजी भाषा को केवल एक विदेशी उपयोगी भाषा की दृष्टि से पढ़ें तो सही पर उसे अपनी मातृ भाषा से अधिक मान न दें। अपने दैनिक जीवन में, पत्र व्यवहार में, स्वाध्याय और अध्ययन में हिन्दी के माध्यम से हम पढ़ते और बोलते हैं उसी के भाव एवं आदर्श हमारे मस्तिष्क में स्थान जमाते हैं।

🔶 भारतीय साहित्य में ही वह क्षमता है जो भारतीय आदर्शों की ओर हमें प्रेरित करे। रामायण और गीता, वेद और धर्मशास्त्रों का, अपने पूर्वजों के पुनीत चरित्रों और कृतियों का थोड़ा बहुत अध्ययन हमारे नैतिक जीवन में आवश्यक रूप से स्थान प्राप्त करे। चोटी हममें से प्रत्येक के सिर पर होनी चाहिए। बिना जनेऊ कोई कन्धा खाली न हो। हिन्दू संस्कृति के दो प्रधान प्रतीक शिखा और सूत्र—चोटी और जनेऊ आज बुरी तरह उपेक्षित हो रहे हैं। जन साधारण की सांस्कृतिक निष्ठा को कायम रखने के लिए इन दोनों प्रतीकों की आवश्यकता एवं अनिवार्यता समझी जाय।

🔷 पतिव्रत और पत्नीव्रत के आदर्शों पर जोर दिया जाय। लड़कियां इस प्रकार का वेश विन्यास न बनावें जो दूसरों में अवांछनीय उत्तेजना उत्पन्न करे। फैशनपरस्ती और विलासिता, हमारे लिए घातक सिद्ध होगी। पर्दा बुरी बला है। हर बच्चे के षोडश संस्कार कराये जायें ताकि बालक पर तथा घर वालों पर भारतीयता के आदर्शों की छाप पड़े, संस्कार कराने वाले ऐसे पुरोहित पैदा हों जो न केवल धार्मिक कर्मकांड विधिवत् करें वरन् भारतीय आदर्शों की शिक्षा और प्रेरणा उन धर्म अवसरों पर लोगों को प्रदान करें। हमारा प्रत्येक त्यौहार एक सामूहिक सामाजिक संस्कार है, उन्हें इस प्रकार मनाया जाय कि जन साधारण अपने वर्तमान जीवन को प्राचीन आदर्शों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा प्राप्त करे।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 9

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (अन्तिम भाग)

🔷 सात्विक अहंकार वाला साधक अपनी बुद्धि के अनुसार किसी एक तरफ झुक पड़ता है। वह किसी एक निर्दिष्ट साधन पद्धति को अंगीकार करके उसकी सिद्धि...