मंगलवार, 29 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 121)

👉 गुरूगीता से मिलता है ज्ञान का परम प्रकाश
🔷 गुरूगीता के महामंत्रों का अवतरण जिसके अन्तस् में हुआ, समझो वहाँ आध्यात्मिक प्रकाश की धाराएँ बरस गयीं। उसे सद्गुरू कृपा व ईश्वर कृपा का वरदान मिल गया। जिनके अन्तःकरण में आध्यात्मिक भावों का उदय होता है, उनमें यह चाहत भी जगती है कि सद्गुरू का सान्निध्य मिले ,ईश्वर की कृपा मिले। पर कैसे? इसकी विधि उन्हें नहीं मालूम होती। इस विधि के अभाव में पल्ले पड़ती है, तो सिर्फ भटकन ,उलझन और संत्रास। परन्तु जो गुरूगीता के आध्यात्मिक प्रभावों की समझ रखते हैं, वे बड़ी ही आसानी से इससे उबर जाते हैं। गुरूगीता की कृपा जिन्हें प्राप्त है, उन्हें भटकन, उलझन के कंटक नहीं चुभते। इसके अनुष्ठान से उनकी सभी आध्यात्मिक उलझने अन्तःकरण में स्वयमेव फूट पड़ते हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी महत्त्व को बताया गया है। इसमें कहा गया है कि गुरूगीता का जप- पाठ ,अनुष्ठान शक्ति, सूर्य, गणपति, विष्णु, शिव सभी के उपासकों को सिद्धि देने वाला है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान् शिव ने माता से कहा- हे सुमुखि! अब मैं तुम्हें गुरूगीता के अनुष्ठान के लिए योग्य स्थानों का वर्णन करता हूँ। इसके लिए उपयुक्त स्थान सागर, नदी का किनारा अथवा शिव या विष्णु का मंदिर है। भगवती का मंदिर ,गौशाला अथवा कोई देवमंदिर, वट, आँवला वृक्ष, मठ अथवा तुलसी वन इसके लिए शुभ माने गए हैं ।। पवित्र निर्मल स्थान में मौन भाव से इसका जप अनुष्ठान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 182

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (अन्तिम भाग)

🔷 सात्विक अहंकार वाला साधक अपनी बुद्धि के अनुसार किसी एक तरफ झुक पड़ता है। वह किसी एक निर्दिष्ट साधन पद्धति को अंगीकार करके उसकी सिद्धि...