गुरुवार, 13 जुलाई 2017

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 3)

🔴 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आभूषण आदी गृहस्थ-जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हैं। हालाँकि सौंदर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन जीवन के आवश्यक अंग हैं। किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है इससे गृहस्थ-जीवन में आर्थिक समस्यायें बढ़ गयी हैं। हर व्यक्ति आर्थिक तंगी महसूस करता है। एक सौ रुपये कमाता है, डेढ़ सौ का खर्च तैयार रहता है पुरुष के पसीने की कमाई इन सौंदर्य प्रसाधन तड़कीले-भड़कीले वस्त्र जेवर आदि में पानी की तरह बहाई जाती है। और अधिकाँश परिवारों को बजट घाटे में ही चलता है। इसका स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

🔵 इन विभिन्न साज-सज्जा, तड़क-भड़क युक्त फैशनपरस्ती का सबसे बुरा प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है। लोगों की दुष्प्रवृत्तियों, चारित्रिक दुर्बलताओं को प्रोत्साहन देने में सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन अस्वाभाविक बनाव शृंगारों पर है। एक साधारण वेशभूषा में जार ही सती-साध्वी नारी को देखकर बुरे-से-बुरे व्यक्ति में भी सद्भावों का जागरण हो जाता है। जबकि इन चमकती-दमकती तितलियों को देखकर अपरिपक्व लोगों का मन स्वतः ही चलायमान हो सकता है। समाज में बढ़ते हुए अनाचार दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

🔴 सादगी में ही स्वाभाविक सौंदर्य का निवास है। जो सजीव और आकर्षण होता है। सहज सौंदर्य मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को भड़काता नहीं वरन् उनको तृप्त करके पुरोगामी भी बनाता है। कृत्रिम बनाव शृंगार बचकानी प्रवृत्ति है। फूहड़पन असभ्यता की निशानी है। शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत सौंदर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव-जीवन में सत् तत्वों की प्रेरणा स्रोत, देवी बन सकती है। पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 37

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.37

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